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बुधवार, 23 दिसंबर 2015

हनुमान चालीसा - तुलसीदास कृत-श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारी, बनरऊँ रघुवर विमल जसु जो दायकु फल चारी


Hanuman Chalisa
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारी ।।
बनरऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारी ।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरों पवन कुमार ।।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहुकलेस विकार ।।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।  जय कपीस तिहूँ लोक उजागर ।।
रामदूत अतुलित बल धामा।  अंजनी पुत्र पवनसुत नामा ।।
महावीर विक्रम बजरंगी।  कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन विराज सुबेसा।  कानन कुण्डल कुंचित केसा ।।
हाथ बज्र औ ध्वजा विराजे।  काँधे मूँज जनेऊ साजे ।।
संकर सुवन केसरीनंदन।  तेज प्रतापमहा जग बन्दन ।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।  राम काज करिबे को आतुर ।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।  राम लखन सीता मन बसिया ।।
सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।  विकट रूप धरि लंक जरावा ।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे।  रामचंद्र के काज सँवारे ।।
लाय संजीवन लखन जियाये।  श्री रघुवीर हरषि उर लाये ।।
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई।  तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावें।  अस कहीश्रीपति कठ लगावें ।।
सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा।  नारद सारद सहित अहीसा ।।
जम कुबेर दिकपाल जहाँ ते।  कवि कोविद कही सके कहाँ ते ।।
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।  राममिलाय राजपद दीन्हा ।।
तुम्हरो मन्त्र विभीसन माना।  लंकेस्वर भये सब जग जाना ।।
जुग सहस जोजन पर भानु।  लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।।
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि।  जलधि लांघी गये अचरज नाही ।।
दर्गम काज जगत के जेते।  सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।।
राम दुआरे तुम रखवारे।  होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहें तुम्हारी सरना।  तुम रक्षक काहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपे।  तीनो लोक हाँक ते काँपे ।।
भूत पिशाच निकट नहि आवे।  महावीर जब नाम नाम सुनावे ।।
नासे रोग हरि सब पीरा।  जपत निरंतरहनुमत बीरा ।।
संकट ते हनुमान छुडावे।  मन क्रम वचन ध्यान जो लावे ।।
सब पर राम तपस्वी राजा।  तिन के काज सकल तुम साजा ।।
और मनोरथ जो कोई लावे।  सोई अमित जीवन फल पावे ।।
चारों जुग प्रताप तुम्हारा।  हें परसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधु संत के तुम रखवारे।  असुर निकन्दन राम दुलारे ।।
अस्ट सिद्धि नों निधि के दाता।  असबर दीन जानकी माता ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।  सदा रहो रघुपति के दासा ।।
तुम्हरे भजन राम को पावे।  जनम जनमके दुःख बिसरावे ।।
अन्त काल रघुवर पुर जाई।  जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।।
और देवता चित्त न धरई।  हनुमत सेई सर्ब सुख करई ।।
संकट कटे मिटे सब पीरा।  जो सुमिरेहनुमत बलबीरा ।।
जे जे जे हनुमान गोसाई।  कृपा कहु गुरुदेव की नाई ।।
जो सत बार पाठ कर कोई।  छुटेहि बंदि महा सुख होई ।।
जो यह पड़े हनुमान चालीसा।  होई सिद्धि साखी गोरिसा ।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।  कीजे नाथ ह्रदय महँ डेरा ।।

पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।
Hanuman Chalisa

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

श्री सूर्य देव चालीसा

 
श्री सूर्य देव
॥दोहा॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥

॥चौपाई॥
जय सविता जय जयति दिवाकर!। सहस्त्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर!। सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित। भास्कर करत सदा मुखको हित॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
अस जोजन अपने मन माहीं। भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥
॥दोहा॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

बुधवार, 7 नवंबर 2012

॥ श्री राम चालीसा ॥ (in Hindi Script)

श्री रघुवीर भक्त हितकारी ।  सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई ।  ता सम भक्त और नहिं होई ।।

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।  ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।  जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला ।  रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गुंसाई ।  दीनन के हो सदा सहाई ।।

ब्रहादिक तव पारन पावैं ।  सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी ।  तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।

गुण गावत शारद मन माहीं ।  सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई ।  ता सम धन्य और नहिं होई ।।

राम नाम है अपरम्पारा ।  चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो ।  तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।

शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।  महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा ।  पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।

भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।  तासों कबहुं न रण में हारो ।।
नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा ।  सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी ।  सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई ।  युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।

महालक्ष्मी धर अवतारा ।  सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायो ।  भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।

घट सों प्रकट भई सो आई ।  जाको देखत चन्द्र लजाई ।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत ।  नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।

सिद्घि अठारह मंगलकारी ।  सो तुम पर जावै बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई ।  सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।

इच्छा ते कोटिन संसारा ।  रचत न लागत पल की बारा ।।
जो तुम्हे चरणन चित लावै ।  ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा ।  नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी ।  सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।  सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।  तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।

सुनहु राम तुम तात हमारे ।  तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे ।  तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।

जो कुछ हो सो तुम ही राजा ।  जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम आत्मा पोषण हारे ।  जय जय दशरथ राज दुलारे ।।

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा ।  नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।  नाम तुम्हार हरत संतापा ।।

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया ।  बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।  तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।

याको पाठ करे जो कोई ।  ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा ।  सत्य वचन माने शिर मेरा ।।

और आस मन में जो होई ।  मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै ।  तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।

साग पत्र सो भोग लगावै ।  सो नर सकल सिद्घता पावै ।।
अन्त समय रघुबरपुर जाई ।  जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।

श्री हरिदास कहै अरु गावै ।  सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।


।। दोहा ।।

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।  हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ।।
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।  जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ।।

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श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।

Shri Raam -Balak Raam with his mother



श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील-नीरद सुन्दर ।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश-निकन्दनं ।
रघुनन्दन आनन्द कंद कौशलचन्द दशरथ्-नन्दनं ॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं ।
आजानु-भुज-शर-चाप-धर- संग्राम जित-खरदूषणं ॥

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजन ।
मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजन ॥
मनु हाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो ।
करुणा निधाअन सुजान सील सनेह जानत रावरो ॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषी अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

श्री गणेश चालिसा (Shri Ganesh Chalisa)


जय गणपति सदगुण सदन,
कविवर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करन,
जय जय गिरिजालाल

जय जय जय गणपति गणराजू,
मंगल भरण करण शुभः काजू,
जय गजबदन सदन सुखदाता,
विश्व विनायका बुद्धि विधाता

वक्रतुंडा शुची शुन्दा सुहावना,
तिलका त्रिपुन्दा भाल मन भावन,
राजता मणि मुक्ताना उर माला,
स्वर्ण मुकुता शिरा नयन विशाला

पुस्तक पानी कुथार त्रिशूलं,
मोदक भोग सुगन्धित फूलं,
सुन्दर पीताम्बर तन साजित,
चरण पादुका मुनि मन राजित

धनि शिव सुवन शादानना भ्राता,
गौरी लालन विश्व-विख्याता,
रिद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे,
मूषका वाहन सोहत द्वारे

कहूं जन्मा शुभ कथा तुम्हारी,
अति शुची पावन मंगलकारी,
एक समय गिरिराज कुमारी,
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा,
तब पहुँच्यो तुम धरी द्विजा रूपा,
अतिथि जानी के गौरी सुखारी,
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी

अति प्रसन्ना हवाई तुम वरा दीन्हा,
मातु पुत्र हित जो टाप कीन्हा,
मिलही पुत्र तुही, बुद्धि विशाला,
बिना गर्भा धारण यही काला

गणनायक गुण ज्ञान निधाना,
पूजित प्रथम रूप भगवाना,
असा कही अंतर्ध्याना रूप हवाई,
पालना पर बालक स्वरूप हवाई

बनिशिशुरुदंजबहितुम थाना,
लखी मुख सुख नहीं गौरी समाना,
सकल मगन सुखा मंगल गावहीं,
नाभा ते सुरन सुमन वर्शावाहीं

शम्भू उमा बहुदान लुतावाहीं,
सुरा मुनिजन सुत देखन आवहिं,
लखी अति आनंद मंगल साजा,
देखन भी आए शनि राजा

निज अवगुण गाणी शनि मन माहीं,
बालक देखन चाहत नाहीं,
गिरिजा कछु मन भेद बढायो,
उत्सव मोरा न शनि तुही भायो

कहना लगे शनि मन सकुचाई,
का करिहौ शिशु मोहि दिखायी,
नहीं विश्वास उमा उर भयू,
शनि सों बालक देखन कह्यौ

पदताहीं शनि द्रिगाकोना प्रकाशा,
बालक सिरा उडी गयो आकाशा,
गिरजा गिरी विकला हवाई धरणी,
सो दुख दशा गयो नहीं वरनी


हाहाकार मच्यो कैलाशा,
शनि कीन्हों लखी सुत को नाशा,
तुरत गरुडा चढी विष्णु सिधाए,
काटी चक्र सो गजशिरा लाये

बालक के धड़ ऊपर धारयो,
प्राण मंत्र पढ़ी शंकर दारयो,
नाम’गणेशा’शम्भुताबकीन्हे,
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा,
पृथ्वी कर प्रदक्षिना लीन्हा,
चले शदानना भरमि भुलाई,
रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई

चरण मातु-पितु के धारा लीन्हें,
तिनके सात प्रदक्षिना कीन्हें
धनि गणेशा कही शिव हिये हरष्यो,
नाभा ते सुरन सुमन बहु बरसे

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढाई,
शेष सहसा मुख सके न गई,
मैं मति हीन मलीना दुखारी,
करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी

भजता ‘रामसुन्दर’ प्रभुदासा,
जगा प्रयागा ककरा दुर्वासा,
अब प्रभु दया दीना पर कीजै,
अपनी भक्ति शक्ति कुछा दीजै

ll दोहा ll

श्री गणेशा यह चालीसा, पाठा कर्रे धरा ध्यान l
नीता नव मंगल ग्रह बसे, लहे जगत सनमाना ll
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेशा l
पूर्ण चालीसा भयो, मंगला मूर्ती गणेशा ll