तीर्थस्थल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तीर्थस्थल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

महाकालेश्वर मंदिर

महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है।

मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। सावन में तो इसकी छटा देखते ही बनती है। कांवड़ियों के जयकारों और मंदिरों के घंटो से ऐसा प्रतित होता है कि जैसे हम किसी शिवलोक में आ गए हैं।

बम बम भोले के जयकारे

इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया।

इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन 1731 से 1801 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं - पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

सावन में लगता है कावड़ियों का मेला

महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था।

लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा 1980 के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया। हाल ही में इसके 198 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है।कहते हैं भोलेनाथ सब की सुनते हैं, इसलिए महाकालेश्वर मंदिर से कोई बी खाली हाथ नहीं लौटता।

कैलाश मानसरोवर

मानसरोवर तिब्बत में स्थित एक झील है ।

यह झील लगभग 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैला हुआ है । इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम मे रक्षातल झील है । यह समुद्रतल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । इसकी परिमिति लगभग 88 किलोमीटर है और औसत गहराई 90 मीटर ।

हिन्दू धर्म में इसे लिए पवित्र माना गया है । इसके दर्शन के लिए हज़ारों लोग प्रतिवर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में भाग लेते है । हिन्दू विचारधारा के अनुसार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुआ था । संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - मन का सरोवर । यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।

अमरनाथ मंदिर के बाद कैलाश मानसरोवर को भगवान शिव का धाम माना गया है. अमरनाथ मंदिर के दर्शनों की तरह यह स्थल भी बेहद दुर्गम स्थान पर स्थित है. मानसरोवर को दूसरा कैलाश पर्वत कहा गया है. भगवान शिव के निवास स्थल के नाम से प्रख्यात यह स्थल अपनी अपरम्पार महिमा के लिये प्रसिद्ध है. यह पर्वत कुल मिलाकर 48 किलोमीटर में फैला हुआ है. कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यधिक कठिन यात्राएं में से एक यात्रा मानी जाती है. इस यात्रा का सबसे अधिक कठिन मार्ग भारत के पडौसी देश चीन से होकर जाता है.
यहां की यात्रा के विषय में यह कहा जाता है, कि इस यात्रा पर वहीं लोग जाते है, जिसे भगवान भोलेनाथ स्वयं बुलाते है. यह यात्रा प्रत्येक वर्ष मई से जून माह के मध्य अवधि में होती है. कैलाश मानसरोवर यात्रा की अवधि 28 दिन की होती है.
कैलाश मानसरोवर स्थल धरती पर किसी स्वर्ग से कम नहीं है. इस स्थल के विषय में यह मान्यता है, कि जो व्यक्ति इस स्थल का पानी पी लेता है. उसके लिये भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में प्रवेश मिल जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी ने मानसरोवर का निर्माण स्वयं किया था.
माता के 51 शक्तिपीठों के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का एक हाथ गिरा था. जिसके बाद ही यह झील बनी है. तभी से यह स्थान मात के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.
कैलाश मानसरोवर मंदिर समुद्र स्थल से 4 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है. इतनी ऊंचाई पर होने के कारण यहां के गौरी नामक कुण्ड में सदैव बर्फ जमी रहती है. इस मंदिर के दर्शनों को आने वाले तीर्थयात्री इस बर्फ को हटाकर इस कुंड में  स्नान करना विशेष रुप से शुभ मानते है.  यहां भगवान शिव बर्फ के शिवलिंग के रुप में विराजित है.    इस स्थान से भारत में जाने वाली कई महत्वपूर्ण नदियां निकलती है. कैलाश मानसरोवर के जल का पानी पीकर, गौरी कुण्ड में स्थान अवश्य किया जाता है.
इस धार्मिक स्थल की यात्रा करने वाले यात्रियों में न केवल हिन्दू धर्म के श्रद्वालु आते है, बल्कि यहां पर बौद्ध व अन्य धर्म के व्यक्ति भी कैलाश मानसरोवर में स्थित भगवान शिव के दर्शनों के लिये आते है, और पुन्य कमा कर जाते है.    
इसी स्थान पर एक ताल है, जो राक्षस ताल के नाम से विख्यात है. इस ताल से जुडी एक पौराणिक कथा प्रचलित है, कि यहां पर रावण ने भगवान शिव कि आराधना की थी. रावण राक्षस कुल के थें. इसी कारण इस ताल का नाम "राक्षस ताल" पडा है.
कैलाश मानसरोवर के विषय में कहा जाता है, कि देव ब्रह्मा जी ने सृ्ष्टि की रचना इसी स्थान पर की थी. यहां पर गंगा नदी कैलाश पर्वत से निकलते हुए चार नदियों का रुप लेती है. जिसके उसके चार नाम हो जाते है. मानसरोवर की यात्रा का दृ्श्य बडा ही मनोरम है. यहां पर प्रकृ्ति का रंग गहरा नीला और बेह्द बर्फीला हो जाता है.

कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले श्रद्वालु यहां आकर कैलाश जी की परिक्रमा अवश्य करते है. कैलाश की परिक्रम करने के बाद मानसरोवर की परिक्रमा की जाती है. यहां के सौन्दर्य को देख कर सभी को इस तथ्य पर विश्वास हो गया कि इस स्थान को ब्रह्माण्ड का मध्य स्थान क्यों कहा जाता है.