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सोमवार, 28 जुलाई 2014

Arya and Castes

Arya means a noble person/ gentleman.

1. If in behavior, speech, actions, one adheres to principles of vedas – is civilized, affectionate to fellow people, not tempted to commit sins, hygienic, promotes and propagates truth, etc – he or she is an Arya. Again it is not a binary logic, but a continuous function.

2. English is a poor approximate of vedic language. But Brahmin, Kshatriya, Vaishya, Shudra are names of varnas or classifications based on profession. They have nothing to do with birth. Shudra is someone who could not get adequetly educated and hence incompetent to be in any of these professions.  People in knowledge based matters are Brahmins, those in state/defence level matters are Kshatriyas, those in financial/ economic jobs are Vaishyas and rest are Shudras.

3. These Varnas are nothing to do with presently used custom of surnames. In fact if you read Ramayan or Mahabharat or other texts of those times, you do not find this tradition of First Name-Middle Name-Surname as nomenclature of people.

I would refute the basis of argument that Arya word denotes parentage in any manner.

1. Of course, family and parentage do have their role in determining sanskaars of a person. But that does not mean that someone from unidentified parentage cannot be Arya. This imaginary casteism is one of the biggest
reasons for our decadence. We foolishly expurged a large majority of our fellow brothers and sisters as Shudras and Achhoots on basis of their unknown or questionable lineage or family.

2. The Arya has nothing to do with one’s gotra. Hardly any surname today represents any Gotra. The gotra classification was to do with preventing marriages between closed relatives.

3. Arya denotes a noble person. Family is only one among many ways to ascertain if someone is noble. And to say that Shudra cannot become Brahmin is again blatantly wrong. Brahmin is someone with knowledge. And Shudra means someone who could not become Brahmin, Kshatriya or Vaishya due to lack of edcation or training. So even a Shudra, after having gained knowledge through efforts can become Brahmin.

4. Dwija means twice born. From birth everyone is Shudra. But after education, Brahmins, Kshatriya and Vaishya take another birth as skilled humans. In other words, education gives them another birth as civilized
people worthy of contributing to society. Thus they become Dwija – twice born. Those who are unable to gain education lose this opportunity of new birth and hence remain Shudra.

Thus an illiterate son of Brahmin is also shudra. And any shudra, after having gained knowledge through his or her efforts can become a brahmin, vaishya or kshatriya. This has nothing to do with biological birth.

Until we are able to throw away this tail of birth based caste, we can never be a united front for vedic empire.

Lets embrace truth and reject the trash.

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

बेल पत्र का उपयोग शिव जी की आराधना में क्यों किया जाता है?


सावन महीने में भगवन शिव की आराधना की जाती है| सारे सनातनी गंगा की पवित्र जल से भगवन शिव का अभिषेक करते है| शिव की पूजा में गंगा जल, बेल पत्र, चन्दन, दूध, घतुरा अदि चीजो का इस्तेमाल किया जाता है| आज हमें जानने की जरुरत है की इन सबके पीछे कौन सी वैज्ञानिक सोच है|
बिल्व (बेल ) - Bael (Aegle marmelos)


बेल का पेड़ एक औषधि का वृक्ष है जिसमे अनेको ऐसे औशाधिये गुण है जो मानव को स्वस्थ तो रख ही सकते है साथ ही पर्यावरण को भी स्वच्क्ष रखा सकते है| बेल पर्त्रो में अनेको ऐसे तत्वा मिलते है जो की कीटाणु और विषाणु नाशक है जैसे की सल्फर, फास्फोरस आदि|अब हम बेल पत्र के उपयोग की पूरी प्रक्रिया को समझते है| सबसे पहले भक्त बेल पत्र को इकठ्ठा करने की लिए सुबह उठ कर आस पास के बगीचे में जाता है जहा उसे टहलने के क्रम में घास पर टहल कर जाना होता है जिससे उसे स्वस्थ लाभ मिलता है घास पर पारी ओस की बूंदों से वो काफी स्वस्थ महसूस करता है साथ ही उसके आँखों जी ज्योति भी बढती है|  इसके उपरत हाथो से जब वो बेल पत्रों को तोरता है तो ओस की बूंदों को स्पर्श करता है जिससे वो और भी तरोताजा महसूस करता है तिन पत्ती बेल पत्रों को को इकठ्ठा करने के क्रम में भी उसे अनेको लाभी मिलते है|

पूजा करते समय बेल पत्रों को जल के साथ शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है| और भक्त पुरे मन से शिव की आराधना करते है| जिससे की भक्त को एक अलोकिक सुख मिलता है| संध्या कल को मंदिर का पुजारी सारे पुष्प और बेल पत्रों को एकत्र करके पास के नदी या तालाब में ड़ाल देता है| जैसा की हम लोग जानते है सावन में जोरो की बारिश होती है और ये बारिश का पानी सभी जगह के गंदगियो को बहा कर अपने साथ नदियों और तालाब में ले आता है| इस गंदगी के वजह से सारे नदी और तलब गंदे हो जाते है और उसमे रहने वाले जीव जंतु मरने लगते है| इसलिए तलब को साफ़ रखने के लिए कोई भी कारगर उपाय नहीं होता है| इसलिए उसमे बैल पत्र द्वारा साफ और स्वच्क्षा रखा जाता है|

बैल पत्रों में निहित तत्वा गंदगियो को समेट कर नदी के किनारों पर जमा करने लगती और तालाब में इन गंदगियो को समेट कर तालाब के तली में और किनारों पर जमा करने लगती है जिससे की नदी और तालाब साफ़ हो जाते है| उसके दूषित तत्व पानी से अलग हो जाते है और उसका पानी निर्मल हो जाता है साथ है उसमे औष्धिये गुण भी आ जाते है जो त्वचा रोग को ठीक कर सकता है|

अतः मुर्ख लोगो द्वारा कहा जाना की ये सिर्फ एक रूढ़िवादिता है एक बहुत बरी मुर्खता है| सनातन धर्म के विज्ञानं को समझाने की जरुरत है जो की हमारे फायदे के लिए बनाया गया है| ताकि हम अपना जीवन स्वस्थ रख सके साथ ही वातावरण को भी स्वस्थ रख सके|

-पंडित दयानन्द शास्त्री 

हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था एवं उसका समत्व मूलक सिद्धांत


हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था एवं उसका समत्व मूलक सिद्धांत

हिन्दू धर्म का सर्वोच्च सिधांत अहिंसा, दया, क्षमा, सत्य, समत्व, संयम, सहिष्णुता आदि के आचरण का है.
वेद कहते है-
सर्वं खल्विदं ब्रह्म= यह सब परमात्मा का ही रूप है.
सर्वे भवन्तु सुखिन:= सभी का कल्याण हो, सभी सुखी होवे.
सियाराम मय सब जग जानी= सम्पूर्ण जगत सीता राम मय समझो.

भगवान श्रीकृष्ण कहते है-
मयाततमिदं सर्वं जगदव्यक्त्मुर्तिना//
अव्यक्त मुर्ती मेरे द्वारा सम्पूर्ण जगत व्याप्त है. सर्वत्र आत्मभाव, सर्वत्र परमात्मभाव हि हिन्दू धर्म का मूल मंत्र है.

भगवान श्री कृष्ण कहते है-
विद्याविनयसपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी /
शुनिचैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन: // ५.१//
सम: सर्वेषु भूतेशु मद्भक्तिं लभते नर://१८.५४//

ज्ञान एवं ज्ञान जन्य विनय से संपन्न ब्राह्मन में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में एवं हिंसा वृति से जीवन जीनेवाले लोगों में भी जो समत्व रूप भगवान के दर्शन करता है और जिनके दृष्टि में छोटा-बड़ा, उच्च- नीच, छूत- अछूत आदि का भेद नही है. यही ज्ञानी सर्वोच्च व्यक्ति है. वही मेरे भक्ति को प्राप्त करता है. यह हिन्दू धर्म का मूल सर्वाच्च सिद्धांत है.

विषमता, घृणा, उच्च नीच आदि की वर्त्तमान निम्न मानसिकता विकृत हुई वर्ण व्यवस्था का अंग है. यह प्राचीन समय में समत्व मूलक एवं लोकोपकारी व्यवस्था रही है. यह मनु से भी पहले वेदोक्त है. मनु उसके केवल योजनाकार है. पित्री पुरुष समदर्शी आदि मनु की वर्त्तमान मनु स्मृति भी कालांतर के स्वार्थपूर्ण लोगों के द्वारा विकृत है. क्योंकि वर्त्तमान की मनुस्मृति में जो बाते लिखी है वह आदि मनु कह ही नही सकते. उनकी वह व्यवस्था पहले जन्म पर आधारित थी नकि कर्म पर. मनु का वचन है:-
जन्मना जायते शुद्र: संस्कारात द्विज उच्यते //
प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शुद्र= लघु, बिज की तरह पैदा होता है. परन्तु वह अपनी जैविक उर्जा, बौद्धिक क्षमता, अनुकूल शिक्षा एवं सम्यक दीक्षा के द्वारा समाज के योग्य बड़ा बनता है.

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:// गुण= व्यक्ति का स्वभाव एवं कर्म= तत्तत कर्म, काम करने की योग्यता के अनुसार व्यक्ति का परिचय बनता है. आगे बढ़ने का जन्म तो एक प्रकार से अवसर है. जन्म के बाद व्यक्ति क्या बनेगा इसकी दिशा उसको तय करनी है.
मूल रूप में वर्ण व्यवस्था का प्राचीन रूप केवल योग्यता के अनुसार कार्य का नियोजन मात्र था. कर्म की योग्यता एवं बौद्धिक सुजबुझ पर आधारित सब के लिए समान काम का बटवारा ही उसका मूल मंत्र था. उस में किसी भी प्रकार विषमता, घृणा, उच्च नीच भाव आदि निम्न मानसिकता नही थी.
व्यवस्था को कार्य की दृष्टि से ब्राह्मन= शिक्षक वर्ग, क्षत्रिय= सैनिक वर्ग, वैश्य= व्यापारी वर्ग और शुद्र= मजदूर वर्ग में विभक्त किया गया है. कुछ संयमी, तितिक्षु, अपरिग्रही, विनयी, त्यागी, विरागी, जिज्ञासु प्रवृति के लोग ब्राह्मण= शिक्षक बन जाते थे. उनका काम था स्वयं संयम, त्याग में रहते हुए ज्ञान को पाना और चारो वर्णों के हित में उन्हें ज्ञान देना, धार्मिक कर्म करना और कराना, भोगविलासी वस्तुओं के संग्रह से दूर रहना. वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मन को धन, संपत्ति आदि के संग्रह का अधिकार नही था.. वे संयमी, अपरिग्रही लोग आजीवन भिक्षा वृति से जीवन यापन किया करते थे|
जो लोग आस्तिक, बलिष्ठ, साहसी, उदार, समाज एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए तत्पर थे वे क्षत्रिय= सैनिक बन एवं शासक बन जाते थे. उनका काम था जीवन को हथेली पर रखकर धर्म की, चारो वर्ण के लोगों की एवं अपने राष्ट्र की रक्षा करना. इनको भोगविलास की वस्तुएं रखने एवं धर्म, समाज एवं राष्ट्र रक्षा के लिए धन संग्रह करने का अधिकार था.
वैश्य= व्यापारी वह समुदाय था जो व्यापार के तत्त्व को समझने में समर्थ था. उसका काम था कृषि, गौ पालन एवं व्यापार के द्वारा चारो वर्णों की आवश्यकता की सभी वस्तुएं उत्पन्न करना और उसका सब जगह आवश्यकता के अनुसार समान रूप से वितरित करना. वह धर्म पूर्वक धन का संग्रह समाज एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए कर सकता था.
शेष बचे हुए लोग शुद्र= मजदूर के रूप में समाज के दृढ अंग बन जाते थे. इनका कार्य था सर्विस=सेवा करना. इन्हें वेद में भगवान के पैरों से उत्पन्न कहा है.
पद्भ्यां शुद्रो अजायत// शुद्र= मजदूर भगवान के पैर से उत्पन्न हुए है क्योंकि वे सम्पूर्ण शरीर के आधार पैर की तरह समाज का आधार है.
ब्राह्मन शिक्षा का, क्षत्रिय रक्षा का और वैश्य व्यापार का काम भी मजदूर के बिना नही कर सकता है. इनका काम था शिक्षा, रक्षा एवं व्यापार में मदत करना और योग्यता के अनुसार उस भूमिका के लिए भी अपने को तयार करना. यह समाज अर्थ शास्त्र एवं सर्व समाज था आधार स्तम्भ था. इनका प्रमुख रूप से बारह बलौतदार के रूप में वर्णन है -

१) सूत्रकार= दरजी= वस्त्रों का निर्माण करना, वस्त्र सिलना आदि.
२) कुम्भकार= मिटटी, काष्ठ आदि के जीवनोपयोगी पात्र बनाना,
३) चर्मकार= चर्म सम्बन्धी काम करना. चमड़ी के जूते, चप्पल, बैग, पानी ले आने जाने वाले मशक, पात्र, वाद्य यन्त्र के उपकरण, तलवार की मेन आदि बनाना.
४) तेली= तिल, मूंगफली, सरसों, नारियल, चमेली आदि सभी प्रकार के तेलों को निकलना.
५) माली= फुल को पैदा करना, सूत, तुलसी, चन्दन, मोती आदि की मालाओंको बनाना एवं बुनना.
६) तम्बोली= सुपारी, पान, सौंप आदि मुख शुद्धी के साधन बनाना, ताम्बुल बनाकर लोंगो को खिलाना.
७) लोहकार (लोहार)= लोहे के दैनिक उपयोग में आनेवाले उपकरण, खेत में काम आनेवाले औजार एव सेना के उपयोगी अस्त्र-शस्त्र आदि बनाना,
८) सुवर्णकार= सुवर्ण के गले, नाक, कान, हाथ, पैर आदि में पहनेजानेवाले अलंकार, मुगुट आदि बनाना.
९) सुतार = बड़ई= लकड़ी के घर, गृहोपयोगी सामान, रथ, बैल गाडी आदि बनाना.
१०) नाइ= सौन्दर्य प्रसादन की सामुग्री तयार करना एव केश को काटना, उसकी साज-सज्जा आदि करना.
११) मिस्त्री= घर, महल, मंदिर, धर्म शालाये, कुंए, किल्ले आदि बनाना.
१२) धोबी= वस्त्रों को धुलाना, उनको रंग देना आदि काम करना.और भी बहुत से काम थे वे सब मिलजुलकर एक परिवार की तरह करते थे.

जीवनोपयोगी सामग्री को एवं युद्ध के सामुग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने आने आदि का काम भी यहि समुदाय करता था. इन्हे काम के बदले पर्याप्त मात्रा में आजीविका की सामुग्री, जमीने, घर आदि उपहार के रूप में दिए जाते थे.
ब्राह्मन और शुद्र की सुरक्षा, आजीविका एवं जीवनोपयोगी सामुग्री का दायित्व क्षत्रिय और वैश्य का था. इनके भूखे रहने या मांगकर खाने से क्षत्रिय और वैश्य अपना अपमान, पाप समझते थे. भिक्षा केवल सभी वर्णों के साधु, गुरु कुल के सभी ब्रह्मचारी प्रशिक्षु एवं अपरिग्रही ब्राह्मन की आजीविका थी. जो उन्हें आत्मनिर्भर, निश्चिन्त और निरभिमान बनाती थी.
वे सनातन हिन्दू लोग अति तितिक्षु , सहनशील, धर्म परायण, संतुष्ट एवं अंतर्मुखी प्रवृति के थे. वे असुविधाजनक स्थिति में होते हुए भी अपने अपने काम को पूर्ण समर्पण के साथ धर्म समझकर सम्पन्न किया करते थे. उन में परस्पर प्रेम था. विवाह, सुख दुःख आदि में वे एक दुसरे की मदत किया करते थे.
मैंने स्वयं अपने गाँव में देखा है. चारो वर्णों के लोग बड़े ही प्रेम से रहते थे. बड़े वृद्ध शुद्र जनों को भी हम कम उम्रवाले लोग प्रणाम करते थे. ज्ञान से ब्राह्मन, बल से क्षत्रिय, धन से वैश्य और उमर से शुद्र को पूज्य, बड़ा माना जाता है. साल के अंत में कुम्भार, चर्मकार, नांउ आदि सभी लोग अपना अपना हिस्सा लेने के लिए खेत में आ जाय करते थे. उन्हें खेत से ही किसानों से सालभर से भी ज्यादा अनाज, घास आदि मिल जाता था. वे व्रत, उत्सव, त्यौहार, उपवास, यज्ञ, विवाह, पम्पराएँ आदि सब मिलकर मनाते थे.
वे सभी लोग भगवान को सामने रखकर अर्थ और काम का धर्म पूर्वक उपयोग करते थे.. उनके लिए धर्म से बड़ी दूसरी कोई चीज नही थी. संसारिक संतोष एवं उससे पूर्ण वैराग्य के क्रमिक विकास हेतु शास्त्र ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ कहे है.ये चारो मानव मात्र के जीवन के समान उद्देश्य है. काम और अर्थ का मूल धर्म है.काम और अर्थ को धर्म,निति सम्मत होना चाहिए. तभी वह मोक्ष के प्रति कारण बनेगा, समाज सुखी होगा.उसको मोक्ष मिलेगा.
मोक्ष अर्थात आत्मबोध के फलस्वरूप अज्ञान के साथ सम्पूर्ण मानवीय अज्ञान, जलन, घृणा, इर्षा, रागद्वेष आदि कमियोंका समूल उछेद.
धर्म के आश्रय से नैतिक नियमों के द्वारा लोग व्यवहार को नियमित, संयमित किया जाता है. अपने मन, वाणी, इंद्रियों आदि का संयम कर अपने अपने विश्वास के अनुसार भगवान, देवी, देवताओं आदि का पूजन, पाठ, यज्ञ, दान आदि क्रियाओं के द्वारा अपना भाव समर्पित करना धर्म है. यहाँ तक की भगवान का रूप समझकर पेडपौधों का पूजन, सब के साथ प्रेम पूर्वक आचरण भी एक धर्म की क्रिया का ही अंग है.
मानवीय संकृति उनके रहन सहन, खान पान, पहनावा, भाषा, व्यापार, कला, संगीत एवं तकनीकी आदि के रूप में झलकती है. एक समय यह भारतीय धर्म एवं संकृति अत्यधिक समृद्ध थी. उस समय यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था. यहाँ प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी उन्नत परंपरा से जुडा हुआ था. गुरु नानक देव जी, गुरु रविदास जी, चैतन्य महा प्रभु. आदि शंकराचार्य, तुलसीदासजी, भगवान बुद्ध, भगवान रामकृष्ण, भगवान ऋषभदेव आदि महा पुरुषों की अति समृद्ध परम्पराए इस देश में प्रवाहित हो रही थी.
हमारे पूर्वजों की यह बात अत्यधिक प्रशंसनीय थी की वे एकं सत विप्रा बहुधा वदन्ति के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए. विभिन्न विचारों पर एक जगह बैठकर विचार विमर्ष करते हुए दुसरे के सद विचारों का सम्मान करते थे. उनकी अनेकता में एकता ही सब से बड़ी शक्ति थी. उनमें विपरीत विचारों को भी सुनने एवं उसको पचाने का सामर्थ्य था.एक ही घर में, एक ही परिवार में कोई रामकृष्ण को मानता तो कोई बुद्ध को,कोई शिव को मानता तो कोई महावीर को, कोई गुरु नानक को कोई कबीर को. सभी लोग इस सत्य को जानते थे की जाना वही है, पाना वही है, केवल रास्ते अलग दिख रहे है. उनके विभिन्न विचार भी उनके प्रेम को स्थाई रूप से तोड़ने में समर्थ नहीं थे. उन में मतभेद थे लेकिन मति भेद नहीं.
इसीलिए इस देव भूमि भारत में अनेको मत मतान्तर स्वतंत्र रूप में विकसित हो सके. इस देश के शांति प्रिय विवेकी मनीषियों ने राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानकदेव, संत कबीर, गुरु रविदास जी जैसे अवतारी महा पुरुषों को बड़े ही आदर से स्वीकार किया और उन के विचारों को आगे बढ़ाया. ईसा मसीह, सुकरात, मंसूर, हुसैन साहब जैसे महा पुरुष इस देश की हिन्दू आर्य भूमि में पैदा हुए होते तो यह देश उन्हें सूली पर नहीं चढ़ाता, अपितु उनको अति उल्हास से अपने शिर माथे पर बैठा कर उन के विचारों को आगे बढ़ता.
इतने महान विचारों एवं आचरण वाला महा पुरुषों का यह देश, समाज सामाजिक वैमनस्य पूर्ण भेदभाव एवं अपने लोगों के साथ असहिष्णुता को कैसे प्राप्त हुआ? संभवत: इसका प्रमुख कारण अपनी कमजोरी और बाहरी आक्रमण रहा है. बुद्ध, शंकर, महावीर का यह देश धर्म प्रधान हो गया था.शस्त्र का स्थान शास्त्र ले चुका था. यह देश बाहरी आक्रमण के लिए तैयार ही नहीं था. इस अहिंसा, करुना, पवित्रतता, तप, स्वाध्याय के देश भारत पर एक बहुत बड़ा कष्ट आ पडा, वह था बर्बर, असभ्य, प्राण पिपासु, असहिष्णु, लुटेरे लोगों का इस्लामी आक्रमण. तब यह देश बाहरी आक्रमण के लिए तैयार ही नहीं था. यहाँ तो अहिंसा, तप. दया, करुना की साधना हो रही थी. सम्राट अशोक के बाद तो यहाँ सैन्य शक्ति को करीब करीब समाप्त कर दिया गया था. केवल व्यवस्था बनाये रखने लिए सेना काम कर रही थी. धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिकरूप से समृद्ध भारत पर भूखे नंगे मुस्लिम लुटेरे इस देश पर लगातार आक्रमण करते रहे. उत्तरा पथ के सभी हिन्दू, जैन, बौद्ध मंदिर तोड़ डाले गए. पवित्र हरमंदिर साहब को अपवित्र करने की और पवित्र सरोवर को मिटटी डालकर पाटने की कई बार कोशिस की गई. निरंतर इस्लामी आक्रमण और सातसौ साल की पराधीनता के कारण इस देश की आतंरिक शक्ति एकता, भाईचारा, सौहार्द आदि सामाजिक संस्थागत चीजे नष्ट हो गई.
उस समय चारो वर्ण एक शरीर की तरह प्रेम अपनत्व के साथ रहते थे. उन में उचनीच, छुआछुत जैसी सामाजिक कुरीतियाँ भी नही थी. परन्तु सनातनी भारतीय विदेशी मुगल मुस्लिमों को गोमांस भक्षी अछूत यवन समझते थे और उनके वहाँ जो भी काम करता या उनके संपर्क में आ जाता उसको भी अछूत समझकर बहिष्कृत कर देते थे, उन्हें अछूत शुद्र बना दिया जाता था. चाहे वह ब्राह्मन हो, शुद्र हो, वैश्य हो या क्षत्रिय. आज जिन्हें हम दलित अथवा ओबीसी कहते है वे चारो वर्णों से उपेक्षित किये गए लोग है. इस निरंतर इस्लामी आक्रमण और सातसौ साल की पराधीनता के कारण इस देश का आतंरिक व्यवस्थागत ढाचा बिखर गया. दुर्भाग्य से सुविधा और समृधि, राज्य और राज्य की शक्तियाँ इस्लामी लुटेरों के हाथों में चली गई. भारतीयों की एकता, भाईचारा, सौहार्द आदि समत्वपूर्ण सामाजिक संस्थागत चीजे नष्ट हो गई. उसके जगह पर स्थान लिया छुआछुत, भाई भतिजावाद, पीड़ा, उत्पीडन, विषमता आदि ने.
मुस्लिम सातसौ साल तक इस देश के शासक रहे. उन्होंने इस देश को लुटने, बड़े बड़े किल्ले, महल, कबरे बनाने और नवाब बनने के अलावा कुछ नहीं किया. मुगल के आक्रमण से जितना नुकसान समत्वपूर्ण हिन्दू व्यवस्था को हुआ है उतना किसी से भी नहीं हुआ है.

अत: हमें आर्य हिन्दू संस्कृति की महान गौरवमयी संकृति के उद्धार के लिए अतीत की भूलों का परित्याग कर नए समत्वपूर्ण समाज की स्थापना का संकल्प लेना होगा. हमारी सब से बड़ी शक्ति है- अनेकता में एकता, समता. इनमें विरुद्ध विचारों को भी पचाने का सामर्थ्य है. प्राचीन आर्य गौरव को प्राप्त करने के लिए वंचित किये गए बहुजन समाज के साथ समत्वपूर्ण व्यवहार के द्वारा उनके सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन स्तर को उठाने की भी अति आवश्यकता है.........हरी ॐ.
~ Swami Pranavanand

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

शास्त्रोक्त धर्म

स्वयम्भू मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो , दशकं धर्म लक्षणम् ॥
( धृति (धैर्य) , क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना) , दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना) , अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग) , विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा) , सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस धर्म के लक्षण हैं।)
जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषां न समाचरेत् ॥
(धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये । )



धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

(धर्म उसका नाश करता है जो उसका (धर्म का ) नाश करता है | धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है | अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए | ध्यान रहे धर्मका नाश करनेवालेका नाश, अवश्यंभावी है। )

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धर्म के अर्थ में रिलिजन का भ्रम


धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है यह केवल Religion शब्द का हिन्दी अनुवाद मात्र नहीं है। धर्म शब्द के प्रति भ्रम की यह स्थिति क्षद्म सेक्युलरो(pseudo-secular) के द्वरा उत्पन्न की गई है।  आज के युवाओ को धर्म शब्द का अर्थ अंग्रेजी का शब्दकोश बताता है शायद हम ही अपनी सनातन संस्कृति को पूरी तरह नहीं समझ पाए;  'धर्म' का जब से 'रिलीजन' में अनुवाद हुआ तब से तो इसका अर्थ यही लगाया जाने लगा कि यह एक विशेष प्रकार की पूजा-आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाले  तथा एक प्रकार के मार्ग पर यंत्रवत चलने वाला तथा संप्रदाय विशेष है।

"धर्म" एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका आज तक किसी अन्य भाषा में अनुवाद हो ही नहीं पाया। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है  धर्म एक ऐसा आधार है, जिस पर सत्य, त्याग,बुद्धि, विवेक, चरित्र, शील, निष्ठा, सेवा, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता आदि जैसे गुण पोषित और विकसित होते हैं ।


कर्तव्य की पूर्ति, यानि कर्तव्य को पूरा करना धर्म है । जो भी हमारे दयित्व हैं उन्हें पूरा करना। धर्म इसी को कहते हैं। हमारे जो कर्तव्य हैं उन्हें ठीक तरह से पूरा करना ही धर्म है। कर्तव्य का अर्थ भी गहरा है, केवल जिम्मेदारियां पूरी करना या कर्म करना ही कर्तव्य नहीं है। कर्तव्य शब्द का अर्थ ऐसे कर्म करना जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी को हानि न पहुंचे।  जब हम अपने कर्म इस बात को ध्यान में रखकर करते हैं कि किसी को हमारे कर्मो से सीधे-सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से परेशानी न हो तो समझिए हम धार्मिक हो जाएंगे। फिर हमारे भीतर सत्य, त्याग, क्षमा, दया, अहिंसा जैसे भाव भी अपनेआप आ जाएंगे। इसलिए याद रखिए अगर धर्म को पाना चाहते हैं तो उसके लिए कर्तव्य पथ पर आगे बढ़िए, धर्म अपनेआप मिल जाएगा।  धर्म के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं।


मै धर्मज्ञ मनु तो नहीं बन सकती लेकिन सरल शब्दों यही धर्म है।  कुछ मनुष्य यह इसलिए नहीं सीख पा रहे है क्योकि अधर्मियो ने "धर्म" को साम्प्रदायिकता नाम कि गाली दे कर अपना नाम सेक्यूलरिज्म (यानि कुकुर पंथ ) रख कर लोगो को भ्रमित कर दिया है, जब कि यही कुकुरपंथी ही वास्तविक सांप्रदायिक है।

धर्मज्ञ स्वायम्भु मनु के वचन  "धर्मो रक्षति रक्षितः". जो धर्म की रक्षा करता है वह स्वयं रक्षित होता है यह सूत्र हमारे बीच आज ही उत्पन्न नहीं हुआ इसका इतिहास काल गणना तो मै भी नहीं जानती | लेकिन आज तक इस सूत्र से कोई जिहादी या ओपसडेई  उत्पन्न नहीं हुआ| धर्म का एकमेव लक्ष्य ही "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया" है रिलीजन शब्द से एक ऐसे संकुचित व अपूर्ण भाव का बोध होता है की उसमें धर्म तत्त्व समाहित नहीं होता | विश्व पटल पर रिलीजन केवल मतान्ध लोगो फ़ौज बना रहा है धर्म और religion में धरती और आकाश जैसा अन्तर है|  धर्म को religion कहना धर्म का अपमान है धर्म अनन्त है|
 भाइयो आपसे निवेदन है धर्म का अर्थ अपनी संस्कृति और ग्रंथो से सीखिए  Oxford  या Merriam-Webster  Dictionary से नहीं| आप को विश्व विजय करना है तो सहर्ष कीजिये मुझे कोई आपति नहीं है लेकिन अपनी संस्कृति सभ्यताओं और मूल्यों के साथ खिलवाड़ न करे  यथार्थ जाने और उसे आत्मसात करे।


धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

अर्थ : धर्म उसका नाश करता है जो उसका (धर्म का ) नाश करता है | धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है | अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए | ध्यान रहे धर्मका नाश करनेवालेका नाश, अवश्यंभावी है |

Dharma destroys those that destroy dharma. Dharma protects those that protect it. Hence, Dharma should not be destroyed. keep that in mind  Dharma that is destroyed, destroyers.


( द्वारा वर्षा सिंह चौहान के ब्लॉग से  )



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रीजन और धर्म का शाब्दिक अन्तर, Literal differences between Religion and Dhar

Literal differences between Religion and Dharm रीजन और धर्म का शाब्दिक

धर्म एक संस्कृत शब्द है जिसका आज तक किसी अन्य भाषा में अनुवाद हो ही नहीं पाया। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है धर्म एक ऐसा आधार है जिस पर सत्य, त्याग,बुद्धि, विवेक, चरित्र, शील, निष्ठा, सेवा, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता आदि जैसे गुण पोषित और विकसित होते हैं धर्म का अर्थ तो इतना व्यापक है कि उसकी सीमा तो इस धरती पर तो है ही नहीं|

धर्म के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं। शायद हम ही अपनी संस्कृति को पूरी तरह नहीं समझ पाए 'धर्म' का जब से 'रिलीजन' में अनुवाद हुआ तब से तो इसका अर्थ यही लगाया जाने लगा कि यह एक विशेष प्रकार की पूजा-आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाले तथा एक प्रकार के मार्ग पर यंत्रवत चलने वाला तथा संप्रदाय विशेष है |धर्म शब्द के प्रति भ्रम की यह स्थिति क्षद्म सेक्युलरो(pseudo-secular) के द्वारा उत्पन्न की गई है आज के युवाओ को धर्म शब्द का अर्थ अंग्रेजी का शब्दकोश बताता है

धर्म से तात्पर्य है – धारण करना

धर्म शब्द – ‘धृ’ से बना हुआ है, जिससे तात्पर्य है, धारण करना।
महाभारत में आता है धर्म से ही धारण किया जाता है –

धरति धारयति धर्मः

इसके अतिरिक्त धर्म से सरल अर्थ धारण करने के तात्पर्य में जैसे –
l पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किये हुये है।
l जैसे हम किसी नियम को, व्रत को धारण करते हैं इत्यादि
l धर्म शब्द में विभिन्न अर्थों का समावेश होता है

Meaning: Religion means

obligation, bond, scruple, reverence,
The word religion is derived from Latin root: Re-ligare, lax

Conceptual Meaning:
In General :
l Belief in or sensing of some superhuman controlling power or powers,
entitled to obedience, reverence, and worship,
In a system:
defining a code of living, esp. as a means to achieve spiritual or material
improvement; acceptance of such belief.
l Devotion, fidelity; conscientiousness; pious attachment
l Ex. The devotes of various religions.

Religion is loosely translated as dharma which in fact differ from dharma



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धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं | Dharma is not 'Religion'

धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं बिलकुल भी नहीं है |
धर्म के प्रति एक भ्रान्ति इसके अंग्रेजी के अनुवाद ने उत्त्पन्न कर दी, अंग्रेजी में धर्म को 'रिलीजन' कहा गया, वास्तव में रिलिजन शब्द से जो ध्वनि निकलती है उससे संकीर्णता का आभास होता है|
'धर्म' जब से 'रिलीजन' माना जाने लगा तो इसका अर्थ यही लगाया जाने लगा कि यह एक विशेष प्रकार की पूजा-आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाला तथा एक प्रकार के मार्ग पर यंत्रवत चलने वाला तथा संप्रदाय विशेष है|
रिलीजन शब्द से एक ऐसे संकुचित व अपूर्ण भाव का बोध होता है की उसमें धर्म तत्त्व समाहित नहीं होता |
धर्म का अनिवार्य तत्त्व उसकी उदारता, महानता, सार्वभौम सत्ता में निहित है जिसका लक्ष्य ही " सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया " है जबकि रिलीजन में इस तरह के भाव प्रकट नहीं होते|
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म (५३) - १.४

Dharma is not translation of 'Religion'
A misconception was formed about Dharma when the English word 'Religion' was chosen to represent its meaning. The word 'religion' gives off a feeling of insular traditionalism.
Mistaking Dharma to be merely religion has led to the misunderstanding that Dharma is just a community of people who have faith in a specific set of prayer rituals that they mechanically follow. This specificity became the essence of Dharma.
The word religion emanates a sense of constriction and incompleteness, too restrictive to capture the essence of Dharma.
Generosity, greatness, universality and catholicity are the essential elements of Dharma, as expressed aptly by Dharma's goal of "May all be content, may all be free from all limitations". The word religion does not evoke similar sentiments.
- Pt. Shriram Sharma Acharya
From the Vangmay 53 "Dharma tattva ka darshan aur marm" page - 1.4

सोमवार, 10 सितंबर 2012

शिव शून्य हैं


प्रायः हम प्रकाश को सत्य, ज्ञान , शुभ, पून्य तथा सात्विक शक्तियों का द्योतक समझते हैं तथा अंधकार की तुलना अज्ञान, असत्य जैसे अवगुणों से करते हैं| फिर शिव "रात्रि" क्यों? क्यों शिव को अंधकार पसंद है? क्यों महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए सर्वाधिक महत्व रखता है?

वस्तुतः अंधकार की तुलना अज्ञान तथा अन्य असात्विक गुणों से करना ही सबसे बडी भ्रांति है| वास्तव में अंधकार एवं प्रकाश एक दु्सरे के पुरक हैं जैसे शिव और उनकी सृष्टी | अंधकार शिव हैं, प्रकाश सृष्टी | जो भी हम देखते हैं … धरती, आकाश, सूर्य, चंद्र, ग्रह नक्षत्र, जिव, जंतु, वृक्ष, पर्वत, जलाशय, सभी शिव की सृष्टी हैं, जो नहीं दिखता है वह शिव हैं| जिस किसी का भी श्रोत होता है, आदि होता है, उसकी एक निरधारित आयू होती है तथा उसका अंत भी होता है| प्रकाश का एक श्रोत होता है | प्रकाशित होने के लिए श्रोत स्वयं को जलता है तथा कुछ समय के उपरांत उसकी अंत भी होता है| यह महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रकाश का श्रोत क्या है, वह सुर्य सामान विशाल है या दीपक सामान छोटा, अथवा उसकी आयू कितनी है| महत्वपूर्ण यह है कि उसकी एक आयू है| क्योंकि प्रकाश का श्रोत होता है, श्रोत के आभाव में प्रकाश का भी आभाव हो जाता है| आँख के बंद कर लेने से अथवा अन्य उपायों से व्यवधान उत्पन्‍‌न कर पाने कि स्थिति में प्रकाश आलोपित हो सकता है| क्योंकि प्रकाश कृतृम है|

अंधकार अनादि है, अनंन्त है, सर्वव्यापी है| अंधकार का कोई श्रोत नहीं होता अतः उसका अंत भी नहीं होता| कृतृम उपचारों से प्रकाश की उपस्थिति में हमें अंधकार के होने का आभास नहीं होता, पर जैसे ही प्रकाश की आयू समाप्त होती है हम अंधकार को स्थितिवत पाते हैं| अंधकार का क्षय नहीं होता| वह अक्षय होता है| अंधकार स्थायी है| अंधकार शिव तुल्य है|

अंधकार को प्रायः अज्ञान का पार्याय भी गिना जाता है| वास्तव में प्रकाश को हम ज्ञान का श्रोत मानते हैं क्योंकि प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता है| पर अगर ध्यान दिया जाय तो प्रकाश में हम उतना ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जितना की प्रकाश की परीधि| विज्ञान प्रकाश है| यही कारण है कि जो विज्ञान नहीं देख सकता उसे वह मानता भी नहीं है| वह तब तक किसी तथ्य को स्वीकार नहीं करता जब तक वह उसके प्रकाश की परीधि में नहीं आ जाती| पर यह तो सिद्ध तथ्य है कि विज्ञान अपने इस विचारधारा के कारण हर बार अपनी ही जीत पर लज्जित हुआ है| क्योंकि हर बार जब विज्ञान ने कुछ ऐसा नया खोजा है जिसे खोज के पहले उसने ही नकारा था तो वस्तुतः उसने स्वयं की विचारधारा की खामियों को ही उजागर किया है| हर खोज विज्ञान की पूरानी धारणा को गलत सिद्ध करती हूई नईं धारणा को प्रकाशित करती है जिसे शायद कूछ समयोपरांत कोई नईं धारणा गलत सिद्ध कर दे| क्या यह भ्रातीं मृगतृष्णा (Mirage) नहीं है? स्मरण रहे मृगतृष्णा (Mirage) प्रकाश अथवा दृष्टी का ही दोष है| अंधकार में देखना कठीन अवश्य है पर उसमें दृष्टी दोष नहीं होता| प्रकाश में देखने में अभ्यस्त हमारी आँखें अंधकार मे सही प्रकार देख नहीं सकतीं पर अंधकार में देखने में अभ्यस्त आँखें प्रकाश में स्वतः ही देख सकती हैं| निर्णय?

जब हमरी मंजिल भौगोलिक होती है नजदीक होती है तो प्रकाश सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है|

सृष्टी विस्तृत है| हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं|

सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है| सृष्टी विस्तृत है|

हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं| ईश्वर एक हैं| वे तीन त्रिदेवों अथवा ३३ करोड देवताओं में ही नहीं, अपितू संपूर्ण सृष्टी के कण कण में व्याप्‍त हैं| वे हमारे नश्‍‍वर शरीर के अन्दर की आत्मा हैं| वे हमारे सदविचार हैं|

ब्रह्मा कर्ता हैं, विष्णू कार्य तथा कार्यफल हैं, शिव कारण हैं| त्रिदेव एक वृक्ष के सामन हैं| ब्रह्म उस वृक्ष के तना हैं, विष्णु उस वृक्ष के विस्तार है, डालिया, पत्ते, पूष्प तथा फल सामान हैं| सदाशिव उस वृक्ष के जड हैं| शिव जी की आरती इसी तत्व को संबोधित है| वास्तव में ये त्रिगूण शिव जी की आरती है जिसमे स्पष्ट शब्दों में उलेखित है …

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका|
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका|