गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

भगवान सूर्य की पूजा में प्रयोग होने वाले पुष्प

भगवान सूर्य की पूजा में प्रयोग होने वाले पुष्प

भविष्य पुराण में बलाया गया है कि भगवान सूर्य को यदि एक आक का फूल अर्पण कर दिया जाए तो सोने की दस अशरफिया चढ़ाने का फल मिल जाता है। फूलों का तारतम्य इस प्रकार बतलाया गया है-

हजार अड़हुल के फूल से बढ़कर एक कनेर का फूल होता है, हजार कनेर के फूलों से बढ़कर एक बिल्वपत्र, हजार बिल्वपत्रों से बढ़कर एक पद्म(  सफेद रंग से भिन्न रंग वाला), हजारों रंगीन पद्म पुष्पों से बढ़कर एक मौलसिरी, हजारों मौलसिरी  से बढ़कर एक कुश का फूल, हजार कुश के फूलों से बढ़कर एक शमी का फूल हजार शमी के फूलों से बढ़कर एक नीलकमल हजार नीलकमल हजारों मील और रक्त कमलों से बढ़कर केसर और लाल कनेर का फूल होता है।


यदि इनके फूल ना मिले तो बदले में पत्ते चढ़ाएं और पत्ते भी न मिले तो इनके फल चढ़ाएं। फूल की अपेक्षा माला में दुगना फल प्राप्त होता है रात में कदम के फूल और मुकुर को अर्पण करें और दिन में शेष समस्त फूल। बेला दिन में और रात में भी चढ़ाना चाहिए।

सूर्य भगवान पर चढ़ने योग्य कुछ फूल फूल इस प्रकार हैं। बेला, मालती, काश, माधवी, पाटला, कनेर, जपा,यावन्ति, कुब्जक,कर्णिकार, पीली कटसरैया, चंपा, रोलक, कुंद, काली कटसरैया (वाण), बर्बर मल्लिका, अशोक, तिलक, लोध, अरुषा, कमल, मौलसिरी, अगस्त और पलाश के फूल तथा दुर्वा।


कुछ समकक्ष फूल
शमी का फूल और बड़ी कटेरी का फूल एक समान माने जाते हैं। करवीर की कोटि में चमेली, मौलश्री और पाटला आते हैं। श्वेत कमल और मंदार की श्रेणी एक है। इसी तरह नागकेसर, चंपा, और मुकुर एक समान माने जाते हैं।


विहित पत्र
बेल का पत्र, शमी का पत्र, भंगरैया की पत्ती, तमालपत्र, तुलसी पत्र, काली तुलसी के पत्ते, कमल के पत्ते भगवान सूर्य की पूजा में गृहीत हैं।


भगवान सूर्य के लिए निषिद्ध फूल।

गुंजा (कृष्णाला), धतूरा, कांची, अपराजिता ( गिरी कर्णिका), भटकटैया, तगर और अमड़ा, इन्हें भगवान सूर्य पर न चढ़ाएं। वीरमित्रोदय में इन्हें सूर्य पर चढ़ाने का निषेध किया गया है यथा।


फूलों के चयन की कसौटी

सभी फूलों का नाम गिनाना कठिन है। सब फूल सब जगह मिलते भी नहीं। अतः शास्त्र में योग्य फूलों के चुनाव के लिए हमें एक कसौटी दी है की जो फोन निषेद कोठी में नहीं हैं और रंग रूप तथा सुगंध से युक्त हैं उन सभी फूलों को भगवान को चढ़ाना चाहिए।

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

भगवान विष्णु की पूजा के लिए विहित और निषिद्ध पत्र पुष्प

भगवान विष्णु भगवान विष्णु को तुलसी बहुत ही प्रिय है। एक ओर रत्न मणि तथा स्वर्ण निर्मित बहुत से फूल चढ़ाया जाएं दूसरी ओर तुलसीदल चढ़ाया जाए तो भगवान तुलसीदल को ही पसंद करेंगे। सच पूछा जाए तो यह तुलसी दल की सोलहवीं कला की भी समता नहीं कर सकते। भगवान को कौस्तुभ(माणिक्य) भी उतना प्रिय नहीं है, जितना की तुलसी पत्र-मंजरी। काली तुलसी तो प्रिय है ही किंतु गौरी तुलसी तो और भी अधिक प्रिय है भगवान ने स्वयं अपने श्रीमुख से कहा है कि यदि तुलसीदल न हो तो कनेर, बेला, चंपा, कमल और मणि आदि से निर्मित फूल भी मुझे नहीं सुहाते। तुलसी से पूजित शिवलिंग या विष्णु की प्रतिमा के दर्शन मात्र से ब्रम्ह हत्या का दोष भी दूर हो जाता है। एक ओर मालती अदि की ताज़ी मालाएं हो दूसरी और दूसरी और बासी तुलसी हो तो भी भगवान उसी बासी तुलसी को ही अपनाएंगे।



शास्त्र ने भगवान पर चढ़ने योग्य पत्रों का भी परस्पर तारतम्य बतलाकर तुलसी की सर्वातिशायिता बतलाई हैं जैसे कि चिड़चिड़े की पत्ती से भंगरैया की पत्ती अच्छी मानी गई है तथा उससे अच्छी खैर की और उससे भी अच्छी शमी की, शमी से दूर्वा, दूर्वा से अच्छा कुश, और उससे भी अच्छा दौनाकी, उससे भी अच्छा बेल की पत्ती और उससे भी अच्छा तुलसीदल होता है।

नरसिंह पुराण में फूलों का तारतम्य बतलाया गया है और कहां गया है की दस स्वर्ण सुमनों का दान करने से जो फल प्राप्त होता है वह एक गुमा के फूल चढ़ाने से प्राप्त हो जाता है। इसके बाद उन फूलों का नाम गिनाए गए हैं जिनमें पहले की अपेक्षा अगला उत्तरोत्तर हजार गुना अधिक फलप्रद होता है जैसे घुमा के फूल से हजार गुना बढ़कर एक खैर, हजारों खैर के फूल से बढ़कर एक शमी का फूल, हजारों शमी के फूल से बढ़कर एक मौलसिरी का फूल, हजारों मौलश्री के पुष्पों से बढ़कर एक नन्द्यावर्त आर्वत, हजारों ननन्द्यावर्त से बढ़कर एक कनेर, हजारों कनेर के फूलों से बढ़कर एक सफेद कनेर, हजारों सफेद कनेर से बढ़कर एक कुशा का फूल, हजारों कुशा के फूल से बढ़कर एक वनवेला, हजारों वनवेला के फूलों से एक चंपा, हजारों चंपाओं से बढ़कर एक अशोक, हजारों अशोक के पुष्पों से बढ़कर एक माधवी, हजारों वासंतीयों से बढ़कर एक गोजटा, हजारों गोजटाओं के फूल से बढ़कर एक मालती, हजारों मालती के फूलों से बढ़कर एक लाल त्रिसंधि(फगुनिया), हजारों लाल त्रिसंधि  के फूल से बढ़कर एक सफेद त्रिसंधि, हजारों सफेद त्रिसंधि के फूलों से बढ़कर एक कुंदन का फूल, हजारों कुंदन पुष्पों से बढ़कर एक कमल का फूल हजारों कमल पुष्पों से बढ़कर एक बेला और हजार बेला फूलों से बढ़कर एक चमेली का फूल होता है निम्नलिखित फूल भगवान को लक्ष्मी की तरह प्रिय हैं इस बात को उन्होंने स्वयं श्री मुख से कहा है--

मालती, मौलसिरी, अशोक, कलीनेवारी(शेफालिका), बसंतीनेवारी (नवमल्लिका), आम्रात(आमड़ा), तगर आस्फोत, बेला, मधुमल्लिका, जूही, अष्टपद, स्कंध, कदंब, मधुपिंगल, पाटला, चंपा, हृद्य, लवंग, अतिमुक्तक(माधवी), केवड़ा कुरब, बेल, सायं काल में फूलने वाला श्वेत कमल (कल्हार) और अडूसा

कमल का फूल तो भगवान को बहुत ही प्रिय है। कृष्णरहस्य में बतलाया गया है कि कमल का एक फूल चढ़ा देने से करोड़ों वर्ष के पापों का नाश हो जाता है। कमल के अनेक भेद हैं। उन भेदों के फल भी भिन्न-भिन्न हैं। बतलाया गया है कि सौ लाल कमल चढ़ाने का फल एक श्वेत कमल के चढ़ाने से मिल जाता है तथा लाखों श्वेत कमलों का फल एक नीलकमल से और हज़ारों नील कमलों का फल एक पद्म से प्राप्त हो जाता है यदि कोई भी किसी प्रकार का एक भी पद में चढ़ा दे तो उसके लिए विष्णुपुरी की प्राप्ति सुनिश्चित है।
बलि के द्वारा पूछे जाने पर भक्तराज प्रह्लाद ने भगवन विष्णु को प्रिय कुछ फूलों के नाम बतलाए हैं सुवर्णजाती, शतपुष्पा, चमेली, कुंद, कठचंपा, बाण, चंपा, अशोक, कनेर, जूही, परिभद्र, पाटला, मौलसिरी, अपराजिता, तिलक, अड़हुल, पीले रंग के समस्त फूल और तगर।

पुराणों ने कुछ नाम और गिनाए हैं जो नाम पहले आ गए हैं उनको छोड़कर शेष नाम इस प्रकार हैं अगस्त्य, आम की मंजरी, मालती, बेला, जूही, माधवी, अतिमुक्तक, यावंती, कुब्जई, करण्टक, पीली कटसरैया, धव(धातक), वाण(काली कटसरैया), बर्बरमल्लिका (बेला का भेद) और अडूसा।



विष्णुधर्मोत्तर में बतलाया गया है कि भगवान विष्णु के श्वेत पीले फूल की प्रियता प्रसिद्ध है, फिर भी लाल फूलों में दो पहरिया (बन्धुक), केसर, कुमकुम, अड़हुल के फूल उन्हें प्रिय हैं अतः इन्हें अर्पित करना चाहिए। लाल कनेर और बर्रे भी भगवान को प्रिय है। बर्रे का फूल पीला लाल होता है।

इसी तरह कुछ सफेद फूलों को वृक्षायुर्वेद लाल उगा देता है। लाल रंग होने मात्र से वे अप्रिय नहीं हो जाते, उन्हें भगवान को अर्पण करने चाहिए इस प्रकार कुछ सफेद फूलों के बीच भिन्न-भिन्न वर्ण होते हैं जैसे परिजात के बीच में लाल वर्ण का होता होता है। बीच में भिन्न वर्ण होने से भी उन्हें सफेद फूल माना जाना चाहिए और वह भगवान के अर्पण योग्य हैं।

विष्णुधर्मोत्तर के द्वारा प्रस्तुत नए नाम यह हैं --  तीसी, भूचंपक, पुरन्ध्रि, गोकर्ण और नागकर्ण।

अंत में विष्णुधर्मोत्तर ने पुष्पों के चयन के लिए एक उपाय बतलाया है कि जो फूल शास्त्रों से निषिद्ध ना हो और गंध तथा रूप से संयुक्त हो उन्हें विष्णु भगवान को अर्पण करना चाहिए।



विष्णु भगवान के लिए निषिद्ध पुष्प

विष्णु भगवान पर नीचे लिखे फूलों को चढ़ाना मना है --
आक, धतूरा, कांची, अपराजिता (गिरीकर्णिका), भटकटैया, कुरैया, सेमल, शिरीष, चिचिड़ा(कोशातकी), कैथ, लान्गुली, सहिजन, कचनार, बरगद, गूलर, पाकर, पीपल और आमड़ा(कपितन)।

घर पर रोपे गए कनेर और दुपहरिया के फूल का भी निषेध है

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

जानिए लक्ष्मीजी की कैसी फोटो है शुभ और कैसी है अशुभ

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, मित्रों आज हम बतायेगे की लक्ष्मी जी की कैसी चित्र या मूर्ति को घर में स्थापित करें और किस प्रकार की चित्रों का संस्थापन न करें, जो की घोर हानि का कारण बन सकता है।


लक्ष्मी जी की ऐसी चित्र या मूर्ति को घर में स्थापित न करें, जिसमे वे उल्लू की सवारी कर रहीं हों। इस प्रकार के चित्र और मूर्ति की पूजा करने से धन लाभ नहीं बल्कि नुकसान हो सकता है। धन मिल भी जाये तो वह निरर्थ ही खर्च हो सकता है

चंचल स्वभाव में लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है। उल्लू अँधेरे में रहने वाला जीव है, अँधेरा तम और असत का प्रतीक है, और उल्लू अज्ञान का, उल्लू पर सवार लक्ष्मी अत्यंत चंचल होती है। चंचल लक्ष्मी कही भी जादा देर नही टिकती है

लक्ष्मीजी की कैसी फोटो है शुभ और कैसी है अशुभ


ऐसी चित्र या मूर्ति को भी घर में स्थापित न करें जिसमे लक्ष्मी जी खड़ी हों, यह भी अस्थिर लक्ष्मी का प्रतीक है
लक्ष्मीजी की कैसी फोटो है शुभ और कैसी है अशुभ


लक्ष्मी की ऐसे फोटो की पूजा करनी चाहिए जिसमे वे भगवान विष्णु के साथ गरूण पर सावार हों। ऐसे चित्र की पूजा से शुभ धन की प्राप्ति होती है और यह धन घर में स्थिर भी रहता है

दिवाली पर गणेश और लक्ष्मी की पूजा का अप्रत्यक्ष आशय यह है की गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के प्रतिक है और लक्ष्मी जी सौभाग्य और सम्पन्नता की प्रतीक है
लक्ष्मीजी की कैसी फोटो है शुभ और कैसी है अशुभ


अगर घर में लक्ष्मीं जी की चित्र लगनी हो तो ऐसी चित्र लगायें जिसमे वे बैठी हों। दीवाली पर जब लक्ष्मी जी के पूजन के लिए मूर्ती कर चयन करें तो, कमल आसन पर विराजमान लक्ष्मी की मूर्ती की स्थापना और पूजन करें

लक्ष्मीजी की कैसी फोटो है शुभ और कैसी है अशुभ


जिससे सुभ लक्ष्मी आपके धर में सदैव विराजमान रहे है 

बुधवार, 29 मार्च 2017

देवी भगवती को चढ़ने वाले पत्र पुष्पों

आज हम देवी भगवती को चढ़ने वाले पत्र पुष्पों के बारे में बताएगें। भगवान शंकर की पूजा में जो पत्र पुष्प विहित है, वे सभी भगवती गौरी को प्रिय है अपामार्ग उन्हें विशष प्रिय है। भगवान शंकर पर चढाने के लिए जिन फूलों का निषेध है तथा जिन फूलों का नाम नहीं लिया गया है वे भी भगवती  पर चढ़ाये जाते है। जितने लाल फूल है वे सभी भगवती को अभीष्ट है तथा समस्त सुगन्धित श्वेत फूल भी भगवती को विशेष प्रिय है।



बेला, चमेली, केसर, श्वेत और लाल फूल, श्वेत कमल, पलाश, तगर, अशोक, चंपा, मौल्शिरी, मंदार, कुंद लोध, कनेर, आक, शीशम, और अपराजिता( शंखपुष्पी)आदि के फूलों से देवी की भी पूजा की जाती है।

इन फूलों में आक और मंदार इन दोनों फूलों का निषेध भी मिलता है। अतः ये दोनों विहित भी है और प्रतिषिद्ध भी हैं। जब अन्य विहित फूल न मिलें तब इन दोनों का उपयोग करें। दुर्गा से भिन्न देवियों पर इन दोनों को न चढ़ाएं। किंतु दुर्गा जी पर चढ़ाया जा सकता है, क्यों कि पूजा में इन दोनों का विधान हैं।

शमी, अशोक, कर्णिकार( कनियार या अमलतास), गूमा, दोपहरिया, अगस्त्य, मदन, सिंदुवार, शल्लकी, माधवी आदि लताएँ, कुश की मंजरियाँ, बिल्वपत्र, केवड़ा, कदम्ब, भटकटैया, कमल, ये फूल भगवती को प्रिय है।

देवी के लिए विहीत-प्रतिषिद्ध

आक और मदार की तरह दूर्वा, तिलक, मालती, तुलसी भंगरैया और तमाल विहीत-प्रतिषिद्ध हैं अर्थात ये शास्त्र से विहित भी हैं और निषिद्ध भी हैं। विहित-प्रतिषिद्ध के सम्बन्ध में तत्व सागर संहिता का कथन है कि जब शास्त्रों से विहित फूल न मिल पायें तो विहीत-प्रतिषिद्ध फूलों से पूजा कर लेनी चाहियें



शनिवार, 4 मार्च 2017

भगवान शंकर की पूजा के लिए विहित और निषिद्ध पुष्प और पत्र

भगवान शिव को ही महादेव, भोलेनाथ, महेश, रुद्र, नीलकंठ शंकर


भगवान शिव को ही महादेव, भोलेनाथ, महेश, रुद्र, नीलकंठ और शंकर के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हीं का नाम भैरव है। वैदिक ऋचाओं में इन्हीं का नाम रुद्र है।  भगवान शिव को भोले भंडारी कहा जाता है। अगर कोई इन्हें सच्चे मन से एक लोटा जल ही चढ़ा दें तो भी वो प्रसन्न होकर उसे सब कुछ दे डालते हैं।
ऐसे परम दयालू देवादि-देव महादेव भगवान शिव पर फूल चढ़ाने का बहुत अधिक महत्व है।

तपःशील गुणोपेते विप्रे वेदस्य पारगे।
दत्त्वा सुवर्णस्य शतं तत्फलं कुसुमस्य च ।
(वीरमित्रोदय )

एक तप शील सर्व गुण संपन्न और वेदों में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह भगवान शंकर पर सौ फूल चढ़ा देने से प्राप्त हो जाता है ।

कौन से पत्र-पुष्प शिव के लिए विहित है और कौन से निषिद्ध इसकी जानकारी अपेक्षित है, आज हम आपको इस बारे में बताएंगे।

भगवान विष्णु के लिए जो पत्र और पुष्प विहित है वे सब भगवान शंकर पर भी चढ़ाये जा सकते है केवल केतकी और केवड़े के पुष्प का निषेध है। -

विष्णोर्यानीह चोक्तानि पुष्पाणि च पत्रिकाः ।
केतकीपुष्पमेकं तु विना तान्यखिळान्यपि ।
शस्तान्येव सुरश्रेष्ठ शंकराराधनाय  हि ।।
(नारद )

शास्त्रों में भगवान शंकर की पूजा में मौलसिरी अर्थात बक/बकुल के पुष्प को अधिक महत्व दिया है -
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शिवं स्पृष्ट्वॆदमुच्यते।
बकपुष्पेण चैकेन शैवमर्चनमुत्तमं।।
(वीरमित्रोदय )

आचारेन्दु में ‘बक’ का अर्थ ‘बकुल’ से किया गया है और ‘बकुल’ का अर्थ है ‘मौलसिरी’।  वीरमित्रोदय के उपरोक्त श्लोक में मौलसिरी का विधान है लेकिन अन्य कथन  ‘बकुलैर्नार्चयेद् दॆवं’ में निषेध किया गया है जो विरोधाभासी प्रतीत होता है। काल विशेष के द्वारा इस विरोधाभास का निवारण हो जाता है - ‘सायाह्ने बकुलं शुभम्’,  अर्थात मौलसिरी को दिन के समय चढ़ाने का निषेध है इसे सायं काल चढ़ाना शुभ  है।

भविष्य पुराण में भगवान शंकर पर चढ़ाने योग्य जिन फूलों को वर्णन किया गया है वे इस प्रकार है –
करवीर अर्थात कनेर, मौलसिरी(बक/बकुल), धतूरा, बड़ी कटेरी, कुरची या कुरैया,  मन्दार यानि आक, अपराजिता, शमी का फूल, शंखपुष्पी, चिचिड़ा(अपामार्ग), कमल,चमेली, नागचम्पा या नागकेसर, चम्पा, खस, तगर,  किंकिरात यानि कटसरैया, गूमा, शीशम, गूलर,  बेला, पलाश जिसे ढाँख के नाम से भी जाता है, बेलपत्र, कुङ्कुम अर्थात केसर, नील कमल और लाल कमल।

वीरमित्रोदय में बतलाया गया है की समस्त फूलों की जातियों में सबसे बढ़कर नील कमल होता है

जल और थल में उत्पन्न होने वाले जितने भी सुगन्धित फूल है वे सभी भगवान शंकर को प्रिय हैं

शास्त्रों में फूलों को चढ़ाने से मिलने वाले फल का तारतम्य भी बताया गया है। जो इस प्रकार है-

दस सुवर्ण माप के बराबर सुवर्ण दान करने का फल एक आक के पुष्प को चढ़ाने से मिल जाता है। एक हजार आक के फूलों को चढ़ाने का जो फल होता है मात्र एक कनेर का पुष्प चढ़ाने से मिल जाता है और एक हजार कनेर पुष्पों का फल एक बिल्व पत्र चढ़ाने से मिल जाता है। एक हजार बिल्व पत्रों का फल एक गूमा फूल चढ़ाने से मिल जाता है इसी तरह एक हजार गूमा से बढ़कर एक चिचिड़ा और हजार चिचिडों से बढ़कर एक कुश का फूल हजार कुश पुष्पों से बढ़कर एक शमी का पत्ता हजार शमी के पत्तों से बढ़ कर एक नील कमल, हजार नील कमल से बढ़कर एक धतूरा और हजार धतूरों से बढ़कर एक शमी का फूल होता है

शिवार्चन में निषिद्ध पत्र पुष्प 

भगवन शंकर पर जो फूल नहीं चढ़ाने चाहिए वे इस प्रकार है -

सारहीन पुष्प, कदम्ब, शिरीष, तिन्तिणी, बकुल (मौलसिरी), कोष्ठ, कैथ, गाजर, बहेड़ा, कपास, गंभारी, पत्रकंटक, सेमल, अनार, धव, केवड़ा और केतकी, बसंत ऋतु में खिलने वाला कंद, कुंद, जूही, मदन्ति, शिरीष सर्ज और दोपहरिया के फूल भगवान  शंकर पर नहीं चढ़ाने चाहिए।

केवडा की दो प्रजातियाँ होती है - सफेद और पीली। सफेद जाति को केवड़ा और पीली को केतकी कहते है।

मित्रों भोले शंकर की भक्ति और अनुकम्पा आप पर सदैव बनी रहे,

आशा है आप के लिए यह जानकारी उपयोगी सिद्ध होगी। हम शीघ्र उपस्थित होंगे नई जानकारी के साथ, इसी के साथ, जय शिव शम्भो

भगवान गणेश की पूजा में कौन से पुष्प और पत्र का प्रयोग करें?

ॐ श्री गणेशाय नमः
भगवान गणेश की पूजा में कौन से पुष्प और पत्र का प्रयोग करें? गणेशजी की उपासना से व्यक्ति का सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की रुकावटें दूर होती हैं।

हिन्दू संस्कृति में, भगवान श्री गणेश जी को, प्रथम पूज्य का स्थान दिया गया है। प्रत्येक शुभ कार्य में सबसे पहले, भगवान गणेश की ही पूजा की जाती है। जब किसी लोक संस्कार या शुभ  कार्य के लिए 'श्री गणेश' का नाम शुभआरम्भ का पर्याय सूचक है।

देवता भी अपने कार्यों को विघ्न रहित पूरा करने के लिए गणेश जी की अर्चना सबसे पहले करते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देवगणों ने स्वयं उनकी अग्र पूजा का विधान बनाया है।

सनातन शास्त्रों में भगवान गणेश जी को, विघ्नहर्ता अर्थात सभी तरह की परेशानियों को खत्म करने वाला बताया गया है। पुराणों में गणेशजी की उपासना शनि सहित सारे ग्रह दोषों को दूर करने वाली भी बताई गई हैं। हर बुधवार के शुभ दिन गणेशजी की उपासना से व्यक्ति का सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की रुकावटें दूर होती हैं।

गणपति पूजन से आपके हर कार्य सफलता पूर्वक हो इसलिए हम गणपति को चढने वाले पत्र पुष्प के बारे में जानकारी देना चाहते है।


हरिताः श्वेतवर्णा वा पञ्चत्रि पत्रसंयुताः ।
दूर्वाङ्कुुरा मया दत्ता एकविंशतिसम्मिताः।।
(गणेशपुराण )


गणेश जी को दूब अर्थात दूर्वा अधिक प्रिय है, इसलिए गणेश जी को सफ़ेद या हरी दूब अवश्य चढ़ानी चाहिए।दूर्वा को चुनते समय एक बात अवश्य ध्यान में रखें की इसकी फुनगी में तीन या पाँच पत्तियां होनी चाहिए।



एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखे की कभी भी गणेश जी पर तुलसी न चढ़ाये। पद्म पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है – “न तुलस्या गनाधिपम” अर्थात तुलसी पत्र से गणेश जी की पूजा न की जाये

गणेश जी की तुलसी पत्र से पूजा न करें। गणेश जी को तुलसी छोड़ कर सभी पत्र पुष्प प्रिय है


कार्तिक महात्म्य में इस बात का वर्णन किया गया है की “गणेशं तुलसी पत्रैः दुर्गां नैव तु दुर्वया” अर्थात गणेश जी की तुलसी पत्र से और माँ दुर्गा की दूर्वा से पूजा न करें। आचारभूषण इस विषय को और विस्तार देता है।

तुलसीं वर्जयित्वा सर्वाण्यपि पत्रपुष्पाणि गणपतिप्रियाणि 

अर्थात गणेश जी को तुलसी छोड़ कर सभी पत्र पुष्प प्रिय है इसलिए सभी अनिषिद्ध पत्र पुष्प गणपति पर चढाये जाते है।


गणपति को नैवेद्य में लड्डू अधिक प्रिय है, आचारेन्दु ग्रन्थ  इस बात पर इस प्रकार प्रकाश डालता है –
“गणेशो लड्डुक प्रियः”
इस लिए गणेश जी को लड्डू और मोदक के भोग लगाना बिलकुल न भूलें।
गणपति को नैवेद्य में लड्डू अधिक प्रिय है,

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

श्री हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की।
जाके बल से गिरिवर कांपै। रोग दोष जाके निकट न झांपै।
अंजनिपुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई।
दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।
लंका जारि असुर संहारे। सीतारामजी के काज संवारे।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्राण उबारे।
पैठि पताल तोरि जम कारे। अहिरावण की भुजा उखारे।
बायें भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।
सुर नर मुनि आरती उतारे। जय जय जय हनुमान उचारे।
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।
जो हनुमान जी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै।



हनुमान चालीसा

बुधवार, 16 मार्च 2016

balamukund astakam

balamukund astakam

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तं
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
karAravindena padAravindam mukhAravinde viniveshayantam
vaTasya patrasya puTe shayAnam bAlam mukundam manasA smarAmi 

संहृत्य लोकान्-वटपत्रमध्ये शयनं-आद्यन्तविहीन रूपम्
सर्वेश्र्वरम् सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
samhrutya lokAn-vaTapatramadhye shayanam-AdyantavihIna rUpam
sarveshwaram sarvahitAvatAram  bAlam mukundam manasA smarAmi 

इन्दीवर-श्यामल-कोमलाङ्गं इन्द्रादि-देवार्चित-पादपद्मं
संतानकल्प-द्रुममं-आश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
indIra-shyAmala-komalAngam indrAdi-devArchita-pAdapadmam
santAnakalpa-drumam-AshritAnAm bAlam mukundam manasA smarAmi  

लम्बालकं लंबित-हारयष्टिं शृङ्गारलीलाङ्कित-दन्तपङ्क्तिं
बिम्बाधरं चारुविशाल-नेत्रं   बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
lambAlakam lambita-hArayaShTim shrungAra-leelAnkita-dantapanktim
bimbAdharam chAruvishAla-netram bAlam mukundam manasA smarAmi  

  शिक्ये निधायाद्य-पयोदधीनि बहिर्गतायं व्रजनायिकायां
भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
 shikye nidhAyAdya-payodadhIni bahirgatAyam vrajanAyikAyAm
bhuktvA yatheShTam kapaTena suptam bAlam mukundam manasA smarAmi  

कलिन्दजान्त-स्थितकालियस्य फणाग्ररङ्गे नटनप्रियन्तं
तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्त्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
kalindajAnta-sthitakAliyasya phaNAgrarange naTanapriyantam
tatpucchahastam sharadinduvaktram  bAlam mukundam manasA smarAmi  

उलूखले बद्धं-उदारशौर्यम् उत्तुङ्ग-युग्मार्जुन-भन्गलीलं
उत्पुल्ल-पद्मायत-चारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
ulUkhale baddham-udArashauryam uttunga-yugmArjuna-bhangaleelam
utpulla-padmAyata-chArunetram bAlam mukundam manasA smarAmi  

आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षं
सच्चिन्मयं देवं-अनन्तरूपं  बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
 Alokya mAturmukhamAdareNa stanyam pibantam sarasIruhAksham
 sacchinmayam devam-anantarUpam bAlam mukundam manasA smarAmi