सोमवार, 24 सितंबर 2012

सती शिव की कथा


दक्ष प्रजापति की अनेको पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं किन्तु  दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे, उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो शक्ति-संपन्न हो। सर्व-विजयिनी हो। दक्ष एक ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म लूगीं, मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी।' फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहाँ जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं। उन्होंने बाल्यकाल में ही कई ऐसे अलौकिक कृत्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय की लहरों में डूब जाना पड़ा।

जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, 'सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदिशक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं।' दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। यद्यपि भगवान शिव के दक्ष के जामाता थे, किंतु एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध पैदा हो गया। *घटना इस प्रकार थी— एक बार ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र थे। भगवान शिव भी एक ओर बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान शिव को किसी के मान और किसी के अपमान से क्या मतलब? वे तो समदर्शी हैं। उन्हें तो चारों ओर अमृत दिखाई पड़ता है। जहां अमृत होता है, वहां कडुवाहट और कसैलेपन का क्या काम?

भगवान शिव कैलाश में दिन-रात राम-राम कहा करते थे। सती के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो उठी। उन्होंने अवसर पाकर भगवान शिव से प्रश्न किया, 'आप राम-राम क्यों कहते हैं? राम कौन हैं?' भगवान शिव ने उत्तर दिया, 'राम आदि पुरुष हैं, स्वयंभू हैं, मेरे आराध्य हैं। सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं।' किंतु सती के कंठ के नीचे बात उतरी नहीं। वे सोचने लगीं, अयोध्या के नृपति दशरथ के पुत्र राम आदि पुरुष के अवतार कैसे हो सकते हैं? वे तो आजकल अपनी पत्नी सीता के वियोग में दंडक वन में उन्मत्तों की भांति विचरण कर रहे हैं। वृक्ष और लताओं से उनका पता पूछते फिर रहे हैं। यदि वे आदि पुरुष के अवतार होते, तो क्या इस प्रकार आचरण करते? सती के मन में राम की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। सीता का रूप धारण करके दंडक वन में जा पहुंची और राम के सामने प्रकट हुईं। भगवान राम ने सती को सीता के रूप में देखकर कहा, 'माता, आप एकाकी यहाँ वन में कहां घूम रही हैं? बाबा विश्वनाथ कहां हैं?' राम का प्रश्न सुनकर सती से कुछ उत्तर देते न बना। वे अदृश्य हो गई और मन ही मन पश्चाताप करने लगीं कि उन्होंने व्यर्थ ही राम पर संदेह किया। राम सचमुच आदि पुरुष के अवतार हैं। सती जब लौटकर कैलाश गईं, तो भगवान शिव ने उन्हें आते देख कहा, 'सती, तुमने सीता के रूप में राम की परीक्षा लेकर अच्छा नहीं किया। सीता मेरी आराध्या हैं। अब तुम मेरी अर्धांगिनी कैसे रह सकती हो! इस जन्म में हम और तुम पति और पत्नी के रूप में नहीं मिल सकते।' शिव जी का कथन सुनकर सती अत्यधिक दुखी हुईं, पर अब क्या हो सकता था। शिव जी के मुख से निकली हुई बात असत्य कैसे हो सकती थी? शिव जी समाधिस्थ हो गए। सती दुख और पश्चाताप की लहरों में डूबने उतारने लगीं।
उन्हीं दिनों सती के पिता कनखल में बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को आमन्त्रित किया था, किंतु शिव जी को आमन्त्रित नहीं किया था, क्योंकि उनके मन में शिव जी के प्रति ईर्ष्या थी। सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता ने बहुत बड़े यज्ञ की रचना की है, तो उनका मन यज्ञ के समारोह में सम्मिलित होने के लिए बैचैन हो उठा। शिव जी समाधिस्थ थे। अतः वे शिव जी से अनुमति लिए बिना ही वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर चली गईं।

कहीं-कहीं सती के पितृगृह जाने की घटना का वर्णन एक दूसरे रूप में इस प्रकार मिलता है— एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं?'
भगवान शकंर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता ने यज्ञ की रचना की है। देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।'
सती ने दूसरा प्रश्न किया, 'क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?'
भगवान शंकर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?'
सती मन ही मन सोचने लगीं, फिर बोलीं, 'यज्ञ के अवसर पर अवश्य मेरी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं,हो सकता है वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'हां, विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती है। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता है।' किंतु सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी कर दिया, उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं, किंतु उनसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा,'तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो, वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर है। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है।' दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं, ‘उन्होंने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता है? अब तो आ ही गई हूं।'
पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, 'पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है। आपने उनका भाग क्यों नहीं दिया?' दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया, 'मै तुम्हारे पति कैलाश को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा।
सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा,'ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं, मुझे धिक्कार है। देवताओ, तुम्हें भी धिक्कार है! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता है। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नरक में जाना पड़ता है। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।' सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक देया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा। वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए।
भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हिए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम! पाहिमाम! भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती है। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है, वंदनीय बना दिया है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

वेद- Veda

वेद(४)

1. ऋग्वेद,
2. यजुर्वेदवेद,
3. सामवेद,
4.अथर्ववेद
वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि पहले मुद्रण की व्यवस्था न होने से इनको एक दुसरे से सुन- सुनकर याद रखा गया इसप्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक/श्रुति = श्रवण परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

वेदों का प्रधान लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान देना ही है। अतः वेद में कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड - इन दोनों विषयों का सर्वांगीण निरुपण किया गया है। वेदों का प्रारम्भिक भाग कर्मकाण्ड है और वह ज्ञानकाण्ड वाले भाग से अधिक है। जिन अधिकारी वैदिक विद्वानों को यज्ञ कराने का यजमान द्वारा अधिकार प्राप्त होता है, उनको ‘ऋत्विक’ कहते हैं। श्रौतयज्ञ में इन ऋत्विकों के चार गण हैं। (१) होतृगण, (२) अध्वर्युगण, (३) उद्गातृगण तथा (४) ब्रह्मगण। उपर्युक्त चारों गणों के लिये उपयोगी मन्त्रों के संग्रह के अनुसार वेद चार हुए हैं।

(१) ऋग्वेद- इसमें होतृवर्ग के लिये उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘ऋक्’ संज्ञक (पद्यबद्ध) मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ऋग्वेद हुआ। इसमें होतृवर्ग के उपयोगी गद्यात्मक (यजुः) स्वरुप के भी कुछ मन्त्र हैं।

(२) यजुर्वेद- इसमें यज्ञानुष्ठान सम्बन्धी अध्वर्युवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘गद्यात्मक’ मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ‘यजुर्वेद’ है। इसमें कुछ पद्यबद्ध, मन्त्र भी हैं, जो अध्वर्युवर्ग के उपयोगी हैं। यजुर्वेद के दो विभाग हैं- (क) शुक्लयजुर्वेद और (ख) कृष्णयजुर्वेद।

(३) सामवेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें गायन पद्धति के निश्चित मन्त्र होने के कारण इसका नाम सामवेद है।

(४) अथर्ववेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के ब्रह्मवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। अथर्व का अर्थ है कमियों को हटाकर ठीक करना या कमी-रहित बनाना। अतः इसमें यज्ञ-सम्बन्धी एवं व्यक्ति सम्बन्धी सुधार या कमी-पूर्ति करने वाले मन्त्र भी है। इसमें पद्यात्मक मन्त्रों के साथ कुछ गद्यात्मक मन्त्र भी उपलब्ध है। इस वेद का नामकरण अन्य वेदों की भाँति शब्द-शैली के आधार पर नहीं है, अपितु इसके प्रतिपाद्य विषय के अनुसार है। इस वैदिक शब्दराशि का प्रचार एवं प्रयोग मुख्यतः अथर्व नाम के महर्षि द्वारा किया गया। इसलिये भी इसका नाम अथर्ववेद है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

शिव शून्य हैं


प्रायः हम प्रकाश को सत्य, ज्ञान , शुभ, पून्य तथा सात्विक शक्तियों का द्योतक समझते हैं तथा अंधकार की तुलना अज्ञान, असत्य जैसे अवगुणों से करते हैं| फिर शिव "रात्रि" क्यों? क्यों शिव को अंधकार पसंद है? क्यों महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए सर्वाधिक महत्व रखता है?

वस्तुतः अंधकार की तुलना अज्ञान तथा अन्य असात्विक गुणों से करना ही सबसे बडी भ्रांति है| वास्तव में अंधकार एवं प्रकाश एक दु्सरे के पुरक हैं जैसे शिव और उनकी सृष्टी | अंधकार शिव हैं, प्रकाश सृष्टी | जो भी हम देखते हैं … धरती, आकाश, सूर्य, चंद्र, ग्रह नक्षत्र, जिव, जंतु, वृक्ष, पर्वत, जलाशय, सभी शिव की सृष्टी हैं, जो नहीं दिखता है वह शिव हैं| जिस किसी का भी श्रोत होता है, आदि होता है, उसकी एक निरधारित आयू होती है तथा उसका अंत भी होता है| प्रकाश का एक श्रोत होता है | प्रकाशित होने के लिए श्रोत स्वयं को जलता है तथा कुछ समय के उपरांत उसकी अंत भी होता है| यह महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रकाश का श्रोत क्या है, वह सुर्य सामान विशाल है या दीपक सामान छोटा, अथवा उसकी आयू कितनी है| महत्वपूर्ण यह है कि उसकी एक आयू है| क्योंकि प्रकाश का श्रोत होता है, श्रोत के आभाव में प्रकाश का भी आभाव हो जाता है| आँख के बंद कर लेने से अथवा अन्य उपायों से व्यवधान उत्पन्‍‌न कर पाने कि स्थिति में प्रकाश आलोपित हो सकता है| क्योंकि प्रकाश कृतृम है|

अंधकार अनादि है, अनंन्त है, सर्वव्यापी है| अंधकार का कोई श्रोत नहीं होता अतः उसका अंत भी नहीं होता| कृतृम उपचारों से प्रकाश की उपस्थिति में हमें अंधकार के होने का आभास नहीं होता, पर जैसे ही प्रकाश की आयू समाप्त होती है हम अंधकार को स्थितिवत पाते हैं| अंधकार का क्षय नहीं होता| वह अक्षय होता है| अंधकार स्थायी है| अंधकार शिव तुल्य है|

अंधकार को प्रायः अज्ञान का पार्याय भी गिना जाता है| वास्तव में प्रकाश को हम ज्ञान का श्रोत मानते हैं क्योंकि प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता है| पर अगर ध्यान दिया जाय तो प्रकाश में हम उतना ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जितना की प्रकाश की परीधि| विज्ञान प्रकाश है| यही कारण है कि जो विज्ञान नहीं देख सकता उसे वह मानता भी नहीं है| वह तब तक किसी तथ्य को स्वीकार नहीं करता जब तक वह उसके प्रकाश की परीधि में नहीं आ जाती| पर यह तो सिद्ध तथ्य है कि विज्ञान अपने इस विचारधारा के कारण हर बार अपनी ही जीत पर लज्जित हुआ है| क्योंकि हर बार जब विज्ञान ने कुछ ऐसा नया खोजा है जिसे खोज के पहले उसने ही नकारा था तो वस्तुतः उसने स्वयं की विचारधारा की खामियों को ही उजागर किया है| हर खोज विज्ञान की पूरानी धारणा को गलत सिद्ध करती हूई नईं धारणा को प्रकाशित करती है जिसे शायद कूछ समयोपरांत कोई नईं धारणा गलत सिद्ध कर दे| क्या यह भ्रातीं मृगतृष्णा (Mirage) नहीं है? स्मरण रहे मृगतृष्णा (Mirage) प्रकाश अथवा दृष्टी का ही दोष है| अंधकार में देखना कठीन अवश्य है पर उसमें दृष्टी दोष नहीं होता| प्रकाश में देखने में अभ्यस्त हमारी आँखें अंधकार मे सही प्रकार देख नहीं सकतीं पर अंधकार में देखने में अभ्यस्त आँखें प्रकाश में स्वतः ही देख सकती हैं| निर्णय?

जब हमरी मंजिल भौगोलिक होती है नजदीक होती है तो प्रकाश सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है|

सृष्टी विस्तृत है| हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं|

सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है| सृष्टी विस्तृत है|

हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं| ईश्वर एक हैं| वे तीन त्रिदेवों अथवा ३३ करोड देवताओं में ही नहीं, अपितू संपूर्ण सृष्टी के कण कण में व्याप्‍त हैं| वे हमारे नश्‍‍वर शरीर के अन्दर की आत्मा हैं| वे हमारे सदविचार हैं|

ब्रह्मा कर्ता हैं, विष्णू कार्य तथा कार्यफल हैं, शिव कारण हैं| त्रिदेव एक वृक्ष के सामन हैं| ब्रह्म उस वृक्ष के तना हैं, विष्णु उस वृक्ष के विस्तार है, डालिया, पत्ते, पूष्प तथा फल सामान हैं| सदाशिव उस वृक्ष के जड हैं| शिव जी की आरती इसी तत्व को संबोधित है| वास्तव में ये त्रिगूण शिव जी की आरती है जिसमे स्पष्ट शब्दों में उलेखित है …

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका|
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका|

गुरुवार, 21 जून 2012

नवग्रहस्तोत्रम् (अर्थ सहित) Navgrah Stotram With Meaning


नवग्रहस्तोत्रम्

 जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।

तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ..१..

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्  ।

नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ..२..

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्.। 

कुमारं शक्ति हस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम् ..३..

प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् । 

सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ..४..

देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसन्निभम् । 

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ..५..

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । 

सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ..६..

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । 

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ..७..

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् । 

सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमामयम् ..८..

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् । 

रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ..९..

इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः । 

दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ..१०..

नरनारीनृपाणां च भवेद्दःस्वप्ननाशनम् । 

ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्द्धनम् ..११..

ग्रहनक्षत्रजाः पीडा स्तस्कराग्नि समुद्भवाः .। 

ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः .. १२..

इति श्री वेद व्यास विरचितं नवग्रह स्तोत्रं सम्पूर्णम् । 

अर्थ-
जपा के फूल की तरह जिनकी कान्ति है, कश्यप से जो उत्पन्न हुए हैं,
अन्धकार जिनका शत्रु है, जो सब पापों को नष्ट कर देते हैं, उन सूर्य भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ.१
दही, शंख अथवा हिम के समान जिनकी दीप्ति है, जिनकी उत्पत्ति क्षीर-समुद्र से है, जो शिवजी के मुकुट पर अलंकार की तरह विराजमान रहते हैं, मैं उन चन्द्रदेव को प्रणाम करता हूँ.२ 
 पृथ्वी के उदर से जिनकी उत्पत्ति हुई है, विद्युत्पुंज के समान जिनकी प्रभा है, जो हाथों में शक्ति धारण किये रहते हैं, उन मंगल देव को मैं प्रणाम करता हूँ. ३  
प्रियंगु की कली की तरह जिनका श्याम वर्ण है, जिनके रूप की कोई उपमा नहीं है, उन सौम्य और गुणों से युक्त बुध को मैं प्रणाम करता हूँ. ४
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, कंचन के समान जिनकी प्रभा है, जो बुद्धि के अखण्ड भण्डार और तीनों लोकों के प्रभु हैं, उन बृहस्पति को मैं प्रणाम करता हूँ. ५
तुषार, कुन्द अथवा मृणाल के समान जिनकी आभा है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं, उन सब शास्त्रों के अद्वितीय वक्ता शुक्राचार्यजी को मैं प्रणाम करता हूँ. ६
नील अंजन के समान जिनकी दीप्ति है, जो सूर्य भगवान् के पुत्र तथा यमराज के बड़े भ्राता हैं, सूर्य की छाया से जिनकी उत्पत्ति हुई है, उन शनैश्चर देवता को मैं प्रणाम करता हूँ. ७  जिनका केवल आधा शरीर है, जिनमें महान् पराक्रम है, जो चन्द्र और सूर्य को भी परास्त कर देते हैं, सिंहिका के गर्भ से जिनकी उत्पत्ति हुई है, उन राहु देवता को मैं प्रणाम करता हूँ. ८
पलाश के फूल की तरह जिनकी लाल दीप्ति है, जो समस्त तारकाओं में श्रेष्ठ हैं, जो स्वयं रौद्र रूप और रौद्रात्मक हैं, ऐसे घोर रूपधारी केतु को मैं प्रणाम करता हूँ. ९
व्यास के मुख से निकले हुए इस स्तोत्र का जो सावधानतापूर्वक दिन या रात्रि के समय पाठ करता है, उसकी सारी विघ्नबाधायें शान्त हो जाती हैं. १०
संसार के साधारण स्त्री पुरुष और राजाओं के भी दुःस्वप्न जन्य दोष दूर हो जाते हैं. ११
किसी भी ग्रह, नक्षत्र, चोर तथा अग्नि से जायमान पीड़ायें शान्त हो जाती हैं. इस प्रकार स्वयं व्यासजी कहते हैं, इसलिए इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए.१२

रविवार, 17 जून 2012

ब्रह्माण्ड और ब्रह्म का स्वरूप


ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है .. वह अनादि है, अनन्त है ... जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है ... वह कण-कण में व्याप्त है, अक्षर है, अविनाशी है, अगम है, अगोचर है, शाश्वत है .. ब्रह्म के प्रकट होने के चार स्तर हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट ... भौतिक संसार विराट है, बुद्धि का संसार हिरण्यगर्भ है, मन का संसार ईश्वर है तथा सर्वव्यापी चेतना का संसार ब्रह्म है ...
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है .. इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म कहलाता है... जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि औपाधिक गुणों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है ...इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है ..ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) कहते हैं ...आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि .. जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ...प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।बाह्य एवं अंत:प्रकृति को वशीभूत करके अपने इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है .... कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान- इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ...बस, यही धर्म का सर्वस्व है... मत, अनुष्ठान पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र हैं...‘आत्मन्’ या आत्मा पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों(concepts) में से एक है.....उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में यह आता है....जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन्तर्निहित उस मूलभूत सत् से किया गया है जो कि शाश्वत तत्त्व है तथा मृत्यु के पश्चात् भी जिसका विनाशनहीं होता....
आत्मा या ब्रह्म के प्रत्यय का उद्भव का उपनिषदों में विचार किया गया है कि – जगत का मूल तत्त्व क्या है/कौन है ? इस प्रश्न का उत्तर में उपनिषदों में ब्रह्म’ से दिया गया है.. अर्थात् ब्रह्म ही वह मूलभूत तत्त्व है जिससे यह समस्त जगत का उद्भव हुआ है – “बृहति बृहंतिबृह्म” अर्थात् बढ़ा हुआ है, बढ़ता है इसलिये ब्रह्म कहलाता है.. यदि समस्त भूत जगत् ब्रह्म की ही सृष्टि है तब तार्किक रूप से हममें भी जो मूलतत्त्व है वह भी ब्रह्म ही होगा.. इसीलिये उपनिषदों में ब्रह्म एवं आत्मा को एक बतलाया गया है.. इसी की अनुभूति को आत्मानुभूति याब्रह्मानुभूति भी कहा गया है..
आत्मा’ शब्द के अभिप्राय – आत्मा शब्द से सर्वप्रथम अभिप्राय ‘श्वास-प्रश्वास’(breathing) तथा ‘मूलभूत-जीवन-तत्त्व’ किया गया प्रतीत होताहै.. इसका ही आगे बहुआयामी विस्तार हुआ जैसे यदाप्नोति यदादत्ति यदत्ति यच्चास्य सन्ततो भवम् ....
तस्माद् इति आत्मा कीर्त्यते...(सन्धि विच्छेद कृत)-------- शांकरभाष्य
अर्थात्, जो प्राप्त करता है(देह), जो भोजन करता है, जो कि सतत् (शाश्वत तत्त्व के रूप में) रहता है, इससे वह आत्मा कहलाता है...उपनिषदों में आत्मा विषयक चर्चा – तैत्तरीय उपनिषत् में आत्मा या चैतन्य के पाँच कोशों की चर्चा की गयी प्रथम अन्नमय कोश, मनोमयकोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनन्दमय कोश..... आनन्दमय कोश से ही आत्मा के स्वरूप की अभिव्यक्ति की गयी है......माण्डूक्यउपनिषत् में चेतना के चार स्तरों का वर्णन प्राप्त होता है –
1. जाग्रत 2. स्वप्न 3. सुषुप्ति 4. तुरीय
यह तुरीय अवस्था को ही आत्मा के स्वरूप की अवस्था कहा गया है -“शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ स आत्मा स विज्ञेयः”-----माण्डूक्योपनिषत्...
छान्दोग्य उपनिषत् इसी सन्दर्भ में इन्द्र एवं विरोचन दोनों प्रजापति के पास जाकर आत्मा(ब्रह्म) के स्वरूप के विषय में प्रश्न करते हैं... यहाँ पर प्रणव या ॐ को इसका प्रतीक या वाचक कहा गया है... बृहदारण्यक उपनिषत् में याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी के संवाद में भी आत्मा के सम्यक् ज्ञानमनन-चिन्तन एवं निधिध्यासन की बात की गयी है तथा इससे ही परमतत्त्व के ज्ञान को भी संभव बतलाया गया है -
आत्मा वा अरे श्रोतव्या मन्तव्या निदिध्यासतव्या...............इन सृष्टि में अनुस्यूत है ब्रह्म .. संसार का अधिष्ठापन ही ब्रह्म नाम से श्रुतियों द्वारा प्रतिपादित है.. जो था, जो है और जो सदैव रहेगा- वही तो ब्रह्म है.. सत्यनाम से ऋषियों-मनीषियों द्वारा वही कहा जाता है..
यहां मिथ्या शब्द असत् से भिन्न है.. मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होनेवाली वस्तु सत्य सी लगती है जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं.. यही मिथ्यात्व है.. इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है..
संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है.. संसार की संसार के रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही ‘जीव’ का अस्तित्व समाप्त हो जाता है.. यह ऐसे ही है जैसे जागने पर स्वप्नकाल के द्रष्टा और दृश्य का को लोप हो जाता है..वस्तुत: यह एकत्व और अद्वैत ही परमार्थ है....सत्य का अर्थ है- जिसका तीनों कालों में बोध नहीं होता अर्थात् जो था, जो है और जो रहेगा..
इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म-सापेक्ष है.. ब्रह्म को जगत् के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता.. जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है, उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी सत्य था.. दूसरे शब्दों में, ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है... श्रुति का वचन है- सदेव सोम्येदग्रमासीत् अर्थात् हे सौम्य .. सृष्टि से पूर्व सत्य ही था..
वेदांत ग्रंथों में व्यावहारिक दृष्टि से ब्रह्म के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए ईश्वर को कारण-ब्रह्म और जगत् को कार्य-ब्रह्म कहा गया है..
ब्रह्म का चिंतन - इस सृष्टि में मानव देह की उपलब्धता सर्वोत्कृष्ट मानी गई है.. मनुष्य जीवन की प्राप्ति परमेश्वर के अनुग्रह का ही फल है जिसने सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन किया है.. इस संसार में मनुष्य जन्म से ही दो तरह की अनुभूतियों से परिचय होता है- सुख और दुख.... सुख-दुख के विषय में विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे निश्चित रूप से जीवन में आई परिस्थितियों से जुड़े रहते हैं.. परिस्थिति अनुकूल होती या प्रतिकूल.. अनुकूल परिस्थितियों से सुख मिलता है जबकि प्रतिकूल परिस्थितियों से दुख की प्राप्ति होती है..
मनुष्य के कल्याण एवं भगवत्प्राप्ति के साधन हेतु अनुकूल परस्थितियों की अपेक्षा प्रतिकूल परिस्थितियाँ अधिक उत्तम सिद्ध होती हैं... अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर मनुष्य भौतिकता में फंस जाता है... लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति आने पर ऐसी संभावना लगभग नहीं रहती तथा मन परमपिता परमात्मा के चरणों में लगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है...
प्रतिकूल परिस्थितियाँ आने पर मानव को प्रभु का अनुग्रह मानना चाहिए क्योंकि यह कृपा केवल उन्हीं पर बरसती है जिन पर उनका विशेष स्नेह होता है... प्रतिकूल परिस्थितियों से घिरने पर व्यक्ति को विशेष सावधानी रखनी पड़ती है... प्रतिकूल परिस्थितियों से घिरने पर व्यक्ति को विशेष सावधानी रखनी पड़ती है, क्योंकि ऐसे समय में सबसे पहले धैर्य, फिर मित्रादि सभी साथ छोड़ने लगते हैं.. यदि ऐसी स्थिति में मनुष्य विचलित होने लगे तो उसका मनोबल टूटने लगेगा.. परन्तु यदि प्रभु पर विश्वास रखते हुए इनका सामना किया जाए तो मनुष्य का आत्मिक विकास होगा, ब्रह्म के चिंतन में वृद्धि होगी, दुष्प्रवृत्तियों से गुजरने वाला व्यक्ति वैसे ही सफल होकर निकलता है जैसे तपने के पश्चात् सोना अधिक चमकदार हो जाता है..लेकिन जिज्ञासा तो अब भी सहज बनी रहती है की ब्रह्म क्या है ? सभी का मानना है कि बिना किसी संतुलित संचालन व्यवस्था के यह संपूर्ण ब्रह्मांड इतने सुव्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता.. यह सर्वोच्च नियामक सत्ता वैदिक दर्शनों में ब्रह्म है...आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद के अनुसार इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी इंद्रियों द्वारा गृहीत है अर्थात् जो कुछ भी दिखाई, सुनाई, सुंघाई या स्पर्श आदि में आता है; वह सब मात्र ब्रह्म ही है.. इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं..जिस प्रकार मिट्टी से निर्मित पात्रों का अलग-अलग नाम-रूप होने के पश्चात् भी मूल रूप मिट्टी ही होती है, इसी प्रकार जो भी जड़ अथवा चेतन तत्व विभिन्न नाम-रूप से ज्ञात होते हैं; वे मूल रूप से ब्रह्म ही हैं... भौतिक विज्ञानी आइंसटीन के नियम के अनुसार इसे पूरे ब्रह्मांड में द्रव्य या ऊर्जा है.. यह दोनों भी आपस में परिवर्तनशील हैं अर्थात् जो द्रव्य या ठोस पदार्थ हमें दिखते हैं; वे भी ऊर्जा से निर्मित हैं और सभी ठोस पदार्थ अंतत: ऊर्जा में ही परिवर्तित हो जाते हैं.. अत: इस पूरे ब्राह्मंड में ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.. अध्यात्म विज्ञान में यही ऊर्जा ब्रह्म है.. हम ‘ब्रह्मांड’ शब्द का प्रयोग इसलिए करते हैं कि यह सर्वव्याप्त ब्रह्म से परिपूर्ण एवं अंडाकार है..
खगोल विज्ञानियों के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति पूर्ण ऊर्जा एवं धूल के कणों में महाविस्फोट से हुई है.. कालांतर में इसी से आकाशगंगाएं, नक्षत्र, तारे एवं ग्रह आदि बने.. सूर्य के विखंडन से संपूर्ण सौरमंडल अस्तित्व में आया.. अध्यात्म विज्ञानी इस सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानते हैं, जबकि खगोल विज्ञानी विस्फोटक से मानते हैं, अर्थात् सभी ग्रहों या पृथ्वी पर जो कुछ भी जड़-चेतन तत्त्व है; वह सूर्य या ब्रह्मांड के मूल तत्त्व से ही बना है... परन्तु नाम-रूप में भिन्नता होने पर भी मूल तत्त्व एक ही है और वह ब्रह्म है...
दर्शन शास्त्रों में ब्रह्म के संदर्भ में एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति कहा गया है...मृत्योपरांत चेतन तत्व द्वारा शरीर को छोड़ने के पश्चात जड़ तत्त्व प्रकृति में विलीन हो जाता है... ब्रह्म को निर्लिप्त, निराकार, निर्विशेष तथा निर्विकार आदि कहा गया है... अध्यात्म शास्त्रियों ने इस ब्रह्मांडीय ऊर्जा के तीन गुण बताए हैं.. इसमें सत् सत्य है, चित् चेतन है तथा आनन्द ब्रह्म स्वरूप है.. इसी को सच्चिदानन्द परमात्मा के रूप में जाना जाता है...इन्सान के मन-मस्तिष्क, दिलो-दिमाग पर अपनी सत्ता कायम करने वाले अनदेखे अनजाने उस ब्रह्म कि मै बात कर रहा हूँ , जो है भी और नहीं भी है? ब्रह्म नहीं है :- क्यों कि मैंने उसे देखा नहीं है, उसका आकर क्या है, प्रकार क्या है, दिखता कैसा है, रंग क्या है ? आज के पढ़े-लिखे इन्सान यकीन तब ही करता है जब उसे देखता है, छुकर उसे महसूस करता है बिना जाने समझे वह किसी भी मनगढ़ंत बातों पर यकीन नहीं करता... वह प्रयोगवादी है और प्रयोग कर सत्य जानने कि कोशिश करता है.. इसी सत्य कि खोज़ में आज का मानव आकाश, पाताल और धरती पर अपनी खोज़ जारी रखी है... इस सत्य कि खोज़ का अंत कहाँ है यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, और इन्सान भविष्य नहीं जान सकता ? जब से इस पृथ्वी पर इंसान कि उत्पत्ति हुई है उसी समय से वह सत्य कि खोज में लगा हुआ है, वह सत्य कि जब एक तार को छेड़ता है तो अनगिनत तरंगे प्रतिध्वनित होती है... अब इन्सान उन अनगिनत तरंगो कि खोज़ शुरू करता है जब उसको सुलझाने के करीब पहुंचता है तो फिर कोई और तरंगे प्रतिध्वनित होती है और खोज़ दर खोज़ यह सिलसिला चलता ही रहता है, चलता ही रहता है ……. यानि वृत्त के छोर को खोजना.. यह कब तक चलेगा, इसका अंत कहाँ है.. इसका जवाब किसी के पास नहीं है ? यह एक अंतहीन सिलसिला है..
ब्रह्म है :- मैंने उसे नहीं देखा है, लेकिन हर पल उसकी उपस्थिति का एहसाश होता है.. शायद वह निराकार है, स्याह अँधेरी काली रात कि तरह जिसमे अपनी आँखों के प्रतिविम्ब नज़र आते है, जिसमे कुछ भी दिखाई नहीं देता है सिर्फ अनुभव किया जा सकता है.. उसकी विशाल सत्ता में नील गगन, नछत्र, तारे, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल है.. मानव शारीर का निर्माण भी पांच तत्वों से हुआ है :- अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश। उसकी सत्ता में जीवन है मृत्यु नहीं है क्यों कि आत्मा अजर-अमर है, इसे कोई भी शक्ति मिटा नहीं सकती है, विनाश होता है तो केवल शारीर का, और यह शारीर फिर उन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाता है.. यह अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है.. उसके साम्राज्य में जीवन कहाँ-कहाँ है आज का विज्ञानं या मानव उसे नहीं ढूढ़ पाया है.. हमारे भारतीय पूर्वजों या ऋषि मुनियों ने पौराणिक पुस्तकों में बहुत से लोक का जिक्र किया है जैसे:- शिवलोक, ब्रम्ह्लोक, विष्णुलोक, इन्द्रलोक, मृत्युलोक और न जाने कौन-कौन से लोक है इस ब्रह्मांड में जहाँ जीवन है... विज्ञानं इस खोज में लगा है, हो सकता है कल दूसरी दुनियां खोज ली जाय, जैसे कि रामसेतु का होना या द्वारिकापुरी का होना पौराणिक पुस्तकों में ही था जब नासा के वैज्ञनिको ने रामसेतु का फोटो और द्वारिकापुरी कि खोज पूरी दुनियां के सामने लाया तब लोगों ने यकीन किया.. वैसे ही जब कोई दूसरी दुनियां ख़ोज ली जाएगी तब लोग यकीन करेंगे, जब कि हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों ने हजारो साल पहले ही दूसरी दुनियां खोज ली थी... पौराणिक पुस्तक में ही सात सूर्य का जिक्र किया गया है जब कि एक ही सूर्य को विज्ञानं आज तक जान पाया है.....
हम सभी मानव, जीव-जंतु, पेड़-पौधा मृत्युलोक के वासी है और मृत्यु ही सत्य है.. अगर हम अपने पुरे जीवन कि गड़ना करे तो पाते है कि २३००० से २५००० दिन भी नहीं जी पाते है इस मृत्युलोक में और इसी २३००० दिनों में बचपन, जवानी और बुढ़ापा सब देख लेते है फिर इस शरीर का अंत हो जाता है... उस ब्रह्म के रचे लीलाओं में से फिर कोई नया पात्र बनकर फिर से कोई नया जीवन जीते है.. यह सिलसिला चलता ही रहता है, जबतक यह सृष्टि है.. उसकी सत्ता में न कोई धर्म है न कोई जाती है और नहीं उंच-नीच का भेद-भाव... यह मानव मस्तिष्क कि विकृति है जो इस मृत्युलोक में धर्म, जाती और उंच-नीच बाँट दिया है... उस अनजाने ब्रम्ह के अनेको नाम है जिसे धर्म के हिसाब से नाम दिए गए है जैसे – ईश्वर, अल्लाह, जीजश
उसकी उपस्थिति हर जगह है आप यकीन करे या नहीं करे ? यकीन करना या नहीं करना यह आपके ऊपर निर्भर करता है.... अगर इस पृथ्वी पर जीवन है तो ब्रह्म भी है....

लेखक : Swami Surenderanand Saraswati

गुरुवार, 31 मई 2012

महामृत्युंजय मंत्र -- मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम् .Maha Mrityunjaya Mantra

महामृत्युंजय (महादेव मंत्र ) का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। 
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है। मंत्र विचार : इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।
शब्द बोधक शब्द बोधक 'त्र' ध्रुव वसु 'यम' अध्वर वसु 'ब' सोम वसु 'कम्‌' वरुण 'य' वायु 'ज' अग्नि 'म' शक्ति 'हे' प्रभास 'सु' वीरभद्र 'ग' शम्भु 'न्धिम' गिरीश 'पु' अजैक 'ष्टि' अहिर्बुध्न्य 'व' पिनाक 'र्ध' भवानी पति 'नम्‌' कापाली 'उ' दिकपति 'र्वा' स्थाणु 'रु' भर्ग 'क' धाता 'मि' अर्यमा 'व' मित्रादित्य 'ब' वरुणादित्य 'न्ध' अंशु 'नात' भगादित्य 'मृ' विवस्वान 'त्यो' इंद्रादित्य 'मु' पूषादिव्य 'क्षी' पर्जन्यादिव्य 'य' त्वष्टा 'मा' विष्णु 'ऽ' दिव्य 'मृ' प्रजापति 'तात' वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।
शब्द की शक्ति- शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति शब्द शक्ति 'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र 'य' यम तथा यज्ञ 'म' मंगल 'ब' बालार्क तेज 'कं' काली का कल्याणकारी बीज 'य' यम तथा यज्ञ 'जा' जालंधरेश 'म' महाशक्ति 'हे' हाकिनो 'सु' सुगन्धि तथा सुर 'गं' गणपति का बीज 'ध' धूमावती का बीज 'म' महेश 'पु' पुण्डरीकाक्ष 'ष्टि' देह में स्थित षटकोण 'व' वाकिनी 'र्ध' धर्म 'नं' नंदी 'उ' उमा 'र्वा' शिव की बाईं शक्ति 'रु' रूप तथा आँसू 'क' कल्याणी 'व' वरुण 'बं' बंदी देवी 'ध' धंदा देवी 'मृ' मृत्युंजय 'त्यो' नित्येश 'क्षी' क्षेमंकरी 'य' यम तथा यज्ञ 'मा' माँग तथा मन्त्रेश 'मृ' मृत्युंजय 'तात' चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-
तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥
संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।
महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

शिव को अति प्रसन्न करने वाला मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। जन साधारण की धारणा है कि इसके जाप से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती परंतु यह पूरी तरह सही अर्थ नहीं है। महामृत्युंजय का अर्थ है महामृत्यु पर विजय अर्थात् व्यक्ति की बार-बार मृत्यु ना हो। वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। उसका शरीर स्वस्थ हो, धन एवं मान की वृद्धि तथा वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए। शिवपुराण में भी महामृत्युंजय मंत्र की महिमा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसी मंत्र के लगातार जाप से कई असाध्य रोगों से भी लाभ पहुंचता है। महामृत्युंजय मेंत्र के पहले तथा बाद उसके बीज मंत्र ú हौं जूँ स: का उच्चारण आवश्यक माना गया है। जिस तरह बिना बीज के जीवन उत्पन्न नहीं होता है उसी तरह बिना बीज मंत्र के महामृत्युंजय मंत्र फलित नहीं होता है। जो पूरे मंत्र का जाप नहीं सकते वे केवल बीज मंत्र के सतत जाप से सभी अभिष्ट फल प्राप्त कर सकते हैं।महामृत्युंजय मंत्र का एक लाख जाप करने पर शरीर की शुद्धि होती है। दो लाख जाप करने पर पूर्वजन्म का स्मरण होता है। तीन लाख जाप करने पर इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। चार लाख जाप करने पर स्वप्न में भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। पांच लाख जाप करने पर भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। दस लाख जाप करने पर संपूर्ण फल की सिद्धि होती है।मंत्र जाप आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से पूर्ण पवित्र होकर करें। जो असहाय बीमार हो वह कैसी भी अवस्था में लेटे-बैठे, बगैर स्नान किए, किसी भी समय, किसी भी उम्र में बीज मंत्रों का जाप कर सकते हैं। उन्हें शिव की कृपा से निरोगता प्राप्त होगी।

महादेव मंत्र

रविवार, 20 मई 2012

आदित्यहृदय स्तोत्रम् (आदित्यहृदयम्) - Aditya Hrudayam (ādityahṛdayam) - Hindi and Sanskrit

Surya ( सूर्य Sūrya, "the Supreme Light"), also known as Aditya, Bhanu or Ravi Vivasvana in Sanskrit, and in Avestan Vivanhant. Aditya is the chief solar deity in Hinduism and generally refers to the Sun.
Ādityahṛdayam (आदित्यहृदयम्, ), is a devotional hymn associated with Aditya or Surya and was recited by the sage Agastya to Rāma on the battlefield before fighting the demon king Rāvana. This historic hymn starts at the beginning of the duel between Rāma and Rāvana. rishi Agastya teaches Rām, who is fatigued after the long battle with various warriors of Lanka, the procedure of worshiping the Sun God for strength to defeat the enemy. These verses belong to Yuddha Kānda (Book 6) Canto 107, in the Rāmāyana as composed by Agastya and compiled by Vālmīki


॥ आदित्यहृदयम्॥  .. ādityahṛdayam .. आदित्यहृदय स्तोत्रम्

जब भगवान् राम रावण के साथ युद्ध करते-करते क्लान्त हो गए, तब ऋषि अगस्त्य ने आकर भगवान् राम से कहा कि ‘३ बार जल का आचमन कर, इस ‘आदित्य-हृदय’ का तीन बार पाठ कर रावण का वध करो ।’ भगवान श्री राम ने इसी प्रकार किया, जिससे उनकी क्लान्ति मिट गई और नए उत्साह का सञ्चार हुआ । भीषण युद्ध में रावण मारा गया ।

सूर्य देव आराधना

भगवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्यपूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रुनाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।


पूजन विधि

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक ताम्बे के कलश में जल भरकर उसमे लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्ग्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा क्क्ष में सूर्य यन्त्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
" ॐ घ्रणी सूर्याय नम: "



ध्यानम्
नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे, जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे
nmah svitre jagtaik chakchhushe,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे, विरिंचि नारायण शंकरात्मने


ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
tato yuddhapariśrāntaṃ samare chintayā sthitam
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam .. 1 ..

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ २॥
upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ .. 2 ..

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ ३॥
yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi .. 3 ..

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ ४॥
jayāvahaṃ japennityam akṣayyaṃ paramaṃ śivam .. 4 ..

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ ५॥
cintāśokapraśamanam āyurvardhanamuttamam .. 5 ..

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
raśmimaṃtaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ ६॥
pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram .. 6 ..

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ ७॥
eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ .. 7 ..

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ ८॥
mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ .. 8 ..

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ ९॥
vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ .. 9 ..

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ १०॥
suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ .. 10 ..

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥ ११॥
timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān .. 11 ..

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥ १२॥
agnigarbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ .. 12 ..

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥ १३॥
ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthīplavaṅgamaḥ .. 13 ..

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥ १४॥
kavirviśvo mahātejāḥ raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ .. 14 ..

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥ १५॥
tejasāmapi tejasvī dvādaśātman namo'stu te .. 15 ..

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥
jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ .. 16 ..

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ .. 17 ..

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥ १८॥
namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ .. 18 ..

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ .. 19 ..

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ .. 20 ..

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
namastamo'bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe .. 21 ..

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ २२॥
pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ .. 22 ..

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥ २३॥
eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām .. 23 ..

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ २४॥
yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ .. 24 ..

॥ फलश्रुतिः॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥ २५॥
kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava .. 25 ..

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ २६॥
etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi .. 26 ..

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ २७॥
evamuktvā tadāgastyo jagāma ca yathāgatam .. 27 ..

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko'bhavattadā
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥ २८॥
dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān .. 28 ..

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥ २९॥
trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān .. 29 ..

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥ ३०॥
sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat .. 30 ..

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥ ३१॥
suragaṇamadhyagato vacastvareti .. 31 ..

॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य॥  ..
iti ādityahṛdayam mantrasya ..


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकीये आदिकाव्ये युद्दकांडे पंचाधिक शततम सर्गः ॥

 आदित्य हृदय स्त्रोतम

इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदय स्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिये देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है। "भगवन सूर्य अपनी अनंत किरणों से शुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओ और असुरो से नमस्कृत , विवस्वान नाम से प्रसिद्द , प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है। ये तेज की र्राशी तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरो सहित सम्पूर्ण लोको का पालन करते है। ये ही ब्रम्हा , विष्णु , शिव , स्कन्द , प्रजापति , इंद्रा , कुबेर , काल , यम , चन्द्रमा , वरुण , पितर , वसु , साध्य , अश्विनी कुमार , मरुद्रण , मनु वायु , अग्नि , प्रजा , प्राण , ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है। इन्ही के नाम आदित्य , सविता , सूर्य , खग , पुषा , गभास्तिमान , सुवर्ण सदृश , भानु , हिरण्यरेता , दिवाकर , हरिदश्व , सहस्त्रार्ची , सप्तसप्ति , मरीचिमान , तिमिरोन्मथन , शम्भू , त्वष्टा , मार्तन्डक, अंशुमान , हिरण्यगर्भ , शिशिर , तपन , अहस्कर रवि , अग्निगर्भ , अदितिपुत्र , शंख , शिशिरनाशन , व्योमनाथ , तमोभेदी , ऋग , यजु और सामवेद के पारगामी , घनवृष्टि , अपामित्र , विन्ध्यावी पल्लवगम , आतापी , मंडली , मृत्यु , पिगल , सर्वतापन , कवि , विश्व , महातेजस्वी , रक्त , सर्वभावोद्द्व , नक्षत्र , गृह और तारो के स्वामी , विश्वभावन , तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है। आपको नमस्कार है। 'पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है। आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्त्रो किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्द है। आपको नमस्कार है। उग्र , वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है। आप ब्रम्हा , विष्णु , शिव के भी स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है , यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है , आप प्रकाश से परिपूर्ण है , सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है , आप रोद्र रूप धारण करने वाले है , आपको नमस्कार है। आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है , सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है , आपको नमस्कार है। आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है , आप हरि और विश्वकर्मा है , तम के नाशक , प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है , आपको नमस्कार है। रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार , सृष्टि और पालन करते है। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है। ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित हॉकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषो को मिलाने वाले फल है। देवता , यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है। सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है , उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है। राघव ! विपत्ति में , कष्ट में , दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है , उसे दुःख नहीं भोगना पडता। इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य ह्र्दय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावन का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे , उसी प्रकार चले गये। अगत्स्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्रीरामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान् सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उनमें उत्साह का नवसंचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्यहृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया। इसलिए ,इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।

सुर्य वंदना व सुर्यनमस्कार

सुर्य वंदना:
आदिदेव। नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर। नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुsते॥

सुर्यनमस्कार
ॐ मित्राय नमः।
ॐ रवये नमः।
ॐ सूर्याय नमः।
ॐ भानवे नमः।
ॐ खगय नमः।
ॐ पुष्णे नमः।
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
ॐ मारिचाये नमः।
ॐ आदित्याय नमः।
ॐ सावित्रे नमः।
ॐ अर्काय नमः।
ॐ भास्कराय नमः।

सुर्यनमस्कार  फलश्रुती
आदितस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मजन्मान्तरसहस्त्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते॥

ब्रह्मतत्व प्रार्थना
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

दीर्घायुष्यासाठीची प्रार्थना
ॐ भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:॥
स्थिरैरग्ङैस्तुष्टुवांसस्तनुभि:।
व्यशेम देवहितं यदायु:॥

कल्याण होण्यासाठीची प्रार्थना
स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा:।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदा:॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि:।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

सरस्वतीची प्रार्थना
प्रणोदेवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।
धीनामवित्र्यवतु॥१॥
चोदयित्रि सूनृतानां चेतंती सुमतीनाम्।
यज्ञं दधे सरस्वती॥२॥
महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना।
धियो विश्वा विराजती॥३॥

आत्मउद्धारासाठीची प्रार्थना
असतो मा सत् गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माsमृतं गमय।
ॐ शांति: शांति: शांति:॥