गुरुवार, 9 नवंबर 2017

हनुमान का पञ्चमुखी धारण करने की कथा

बजरंगबली को सकंटमोचन भी कहा जाता हैं और भगवान हनुमान ने हमेशा अपने नाम को सार्थक किया हैं।

Panchamukha - Sri Panchamukhi Hanuman - पंचमुखी हनुमान की कहानी, जानिए पंचमुखी क्यो हुए हनुमान - श्री पंचमुखी हनुमान रूप पांच चेहरों से बना रूप है जिसमे हर चेहरे का दर्शन कृपा देने वाला है


संकट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, भगवान् हनुमान हमेशा उसका निवारण करने में समर्थ रहे हैं।

रामायण काल में हर कोई अपनी समस्या के निदान के लिए भगवान् हनुमान को ही याद करते  थे. ऐसा ही एक संकट, श्री हनुमान के स्वामी भगवान् राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण पर भी आया था, जिसका निवारण भी श्री हनुमान ने ही किया था।

बजरंगबलि अपनी स्वामी भक्ति के लिए जाने जाते हैं और रामायण का युद्ध भी श्रीराम की वानर सेना ने अगर जीता था तो उसमे हनुमान की बहुत बड़ी भूमिका थी. इसी युद्ध के दौरान भगवान् हनुमान ने अपने कई अवतारों में से एक “पंचमुखी हनुमान अवतार” भी धारण किया था।

लेकिन क्या वजह थी कि श्री हनुमान को पंचमुखी अवतार धारण करना पड़ा था?

रामायण की कथा के अनुसार जब भगवान् राम अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने रावण की लंका गए थे तब कई दिनो तक वहां युद्ध चला था. युद्ध में रावण अपना पक्ष कमज़ोर होता देख, अपने भाई अहिरावण को भी इस युद्ध में भाग लेने के लिए बुलाया था. इस युद्ध में रावण द्वारा अपने भाई को शामिल करने एक की यह वजह थी कि अहिरावण को मायावी शक्तियां प्राप्त थी और रावण इन्ही मायावी शक्तियों का इस्तेमाल कर के यह युद्ध जीतना चाहता था।

इस युद्ध में रावण अपने भाई अहिरावण की मायावी शक्तियों की मदद से श्रीराम की पूरी सेना को गहरी नींद में सुला कर श्री राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था और इसी मुर्छित अवस्था में अहिरावण,  श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले कर चला गया।

जब हनुमान को यह बात ज्ञात हुई तो वह तुरंत पाताल लोक पहुचें लेकिन पाताल लोक के द्वार रक्षक मकरध्वज ने उन्हें प्रवेश करने से रोक दिया था. तब हनुमान ने मकरध्वज से युद्ध कर उसे परास्त किया और पातळ लोक के भीतर पहुचे।

वह पहुचते ही उन्होंने देखा कि माँ भवानी के सम्मुख भगवान् राम और लक्ष्मण मुर्छित अवस्था में पड़े थे और अहिरावण  श्री राम और लक्ष्मण के बलि की तैयारी कर रहा था. लेकिन उस पूजा स्थल में चारों दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे जिसे एक साथ भुझाने पर अहिरावण की मृत्यु हो सकती थी।

भगवान् हनुमान को यह बात ज्ञात होते ही उन्होंने अपना पंचमुखी हनुमान अवतार धारण किया जिसमे वराह मुख, नरसिंह मुख, गरुड़ मुख, हयग्रीव मुख और अंतिम हनुमान मुख थे जिनकी सहायता से उन्होंने एक साथ वह पाँचों दीपक भुझा कर अहिरावण की मृत्यु की थी और श्री राम और लक्ष्मण रक्षा की थी।


पञ्चमुखी रूप की शक्ति

पाँच मुँह से शोभित श्री हनुमान जी के रूप को पञ्च मुखी हनुमान कहते है। यह पञ्च मुख पांच दिशाओ और रूप को बताते है |

यह पांच मुख नरसिंह रूप, गरुड रूप, अश्व रूप, वानर रूप, वराह रूप है जिसमे तीन रूप भगवान् विष्णु के रूप है और अन्य वानर और अश्व का।

1- नरसिंह रूप : यह रूप दक्षिण दिशा की तरफ है पंचमुखी हनुमान का दक्षिण दिशा का मुख भगवान नृसिंह का है । इस रूप की भक्ति से सारी चिंता, परेशानी और डर दूर हो जाता है।

२- गरुड रूप : पश्चिमी मुख वाला है , जिसके दर्शन से संकट और परेशानिया दूर होती है ।

३- अश्व रूप : पंचमुखी हनुमान का पांचवा मुख आकाश की ओर दृष्टि वाला होता है। यह रूप अश्व यानी घोड़े के समान होता है। श्रीहनुमान का यह करुणामय रूप होता है, जो हर मुसीबत से रक्षा करने वाला माना जाता है।

४- वानर रूप : पूर्व दिशा की तरफ है जो बहुत तेजस्वी है और इनकी पूजा और दर्शन से शत्रु पराजित होते है।

५- वराह रूप : उत्तर दिशा का मुख है, जिसकी सेवा पूजन से ऐश्वर्य, यश,दीर्घ आयु व अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

अत: सभी रूप सुखो को देने वाले है और पंचमुखी हनुमान जी की पूजा से सभी तरह के आर्थिक मानसिक सुख प्राप्त होते है।

इन रूपों की पूजा अर्चना के लिए आप पञ्चमुखी हनुमान मंत्र का जप करके सर्व कार्य को सिद्ध कर सकते है।

मेधा सूक्तं — Medha Suktam


Meaning:
Oṁ yaśchandasāmṛṣabho viśvarūpaḥ . Chandobhyo'dhyamṛtātsambabhuva . Sa mendro medhayā spṛṇotu . Amṛtasya deva dhāraṇo bhūyāsam . Śarīraṁ me vicarṣaṇam . Jihvā me madhumattamā . Karṇābhyāṁ bhūriviśruvam . Brahmaṇaḥ kośo'si medhayā pihitaḥ . Śrutaṁ me gopāya .
Oṁ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ..

May the universal form, exalted among the Vedas and born of the essence of the Vedas, bless me with wisdom. May I be blessed with the nectar of immortality. May my body become active. May my tongue speak sweetly. May my ears hear everything well. You are the repository of Brahman, and are hidden by the intellect. May my memory protect me. Om peace, peace, peace.

Medhā devī juṣamānā na āgād-viśvācī bhadrā sumanasyamāna .
Tvayā juṣṭā nudamānā durūktān bṛhadvadema vidathe suvīraḥ ..1..

O goddess of wisdom! You are pleased, all-pervading and have a peaceful mind. Bless us so that we may give up bad speech and speak well in an assembly like heroes.

Tvayā juṣṭa ṛṣirbhavati devi tvayā brahmāgataśrīruta tvayā .
Tvayā juṣṭaścitraṁ vindate vasu sā no juṣasva draviṇo na medhe ..2..

O goddess! Blessed by you one becomes a sage; like Brahma. Blessed by you one attains prosperity. Blessed by you one attains many treasures. Bless us with that wealth of intelligence.

Medhāṁ ma indro dadātu medhāṁ devī sarasvatī .
Medhāṁ me aśvinavavubhavadhattaṁ puṣkarasrajā ..3..

May Indra give me intelligence. May goddess Saraswati give me intelligence. May the two Ashwins, who wear garlands of lotuses, give me intelligence.

Apsarāsu ca yā medhā gandharveṣu ca yanmanaḥ .
Daivīṁ medhā sarasvatī sā māṁ medhā surabhirjuṣhatam̐̐ svāhā ..4..

May Saraswati, who is fragrant, bless me with the divine intelligence which is the wisdom of the Apsaras and the mind of the Gandharvas.

Ā māṁ medhā surabhirviśvarūpā hiraṇyavarṇā jagatī jagamyā .
Ūrjasvatī payasā pinvamānā sā māṁ medhā supratīkā juṣantām ..5..

May that Saraswati, who is intelligence personified, who is fragrant, who is all pervading, who has a golden complexion, who is the earth, who is accessible to all, who is full of vigour, who is overflowing with the nectar of knowledge, and who is beautiful; come to me and bless me with intelligence.

Mayi medhāṁ mayi prajāṁ mayyagnistejo dadātu .
Mayi medhāṁ mayi prajāṁ mayīndra indriyaṁ dadātu .
Mayi medhāṁ mayi prajāṁ mayi sūryo bhrājo dadātu ..6..

May Agni give me intelligence, people and vigour. May Indra give me intelligence, people and bodily power. May Surya give me intelligence, people and brilliance.

Oṁ haṁsa haṁsāya vidmahe paramahaṁsāya dhīmahi .
Tanno haṁsaḥ pracodayāt ..7..

We perceive the Hamsa that is the soul; we meditate on that Hamsa that is the supreme being.
May that Hamsa inspire us (to reach that goal).

Oṁ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ..
Om peace, peace, peace.

This hymn is found in the Taittiriya Aranyakam of the Krishna Yajurveda.
The Shanti Mantram preceding the hymn is found in Prapathaka 4 of Chapter 7.
The hymn itself is composed of Prapathakas 41-44 of Chapter 10.
Notes:

The given version is found in the Taittiriya Aranyakam. Other hymns, also called Medha Suktam can be found in Rigveda and Atharvaveda. This prayer is addressed to the Goddess of learning, Saraswati. It asks her to bless us so that we may become wise. Chanting this hymn daily improves memory, intelligence, grasping power and speaking capacity.

शनिवार, 16 सितंबर 2017

श्री हनुमान वडवानल स्रोत के जाप से तुरंत दर्शन देते हैं बजरंग बली


श्री हनुमान वडवानल स्रोत के जाप से बड़ी से बड़ी समस्या भी टल जाती है

श्री हनुमान वडवानल स्रोत का प्रयोग अत्यधिक बड़ी समस्या होने पर ही किया जाता है। इसके जाप से बड़ी से बड़ी समस्या भी टल जाती है और सब संकट नष्ट होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। श्री हनुमान वडवानल स्रोत के प्रयोग से शत्रुओं द्वारा किए गए पीड़ा कारक कृत्या अभिचार, तंत्र-मंत्र, बंधन, मारण प्रयोग आदि शांत होते हैं और समस्त प्रकार की बाधाएं समाप्त होती हैं।


पाठ करने की विधि

शनिवार के दिन शुभ मुहूर्त में इस प्रयोग को आरंभ करें। सुबह स्नान-ध्यान आदि से निवृत्त होकर हनुमानजी की पूजा करें, उन्हें फूल-माला, प्रसाद, जनेऊ आदि अर्पित करें। इसके बाद सरसों के तेल का दीपक जलाकर लगातार 41 दिनों तक 108 बार पाठ करें। अंत में भगवान को प्रसाद चढ़ाएं तथा अपनी मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करें।


विनियोग
ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः,
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं,
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे
सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम्
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये।

ध्यान
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय
वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र
अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद
सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख
निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर
चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर,
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां
ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां
शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय
शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु
शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान्
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र
पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा।
।।इति विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं।।

Anjana Sutha Stotram

Hauman (Anjana sutha) Stotram
[Prayer addressed to Hanuman]

[Here is a great and rare prayer addressed to Lord Hanuman as son of Anjana.]

1. Sukhekadhaam-bhushnam, Manoja garva-khandanam,
Anathmadhi-vigarhanam, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, to whom the mace looks like an ornament,
Who berates all who are proud and, Punishes those who have not realized Their self

2. Bhavam-budhititushrame, Susevyamana-madbutam,
Shiva-avatarinam-param, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, who assists us to cross the sea of life,
Who serves well in a wonderful manner and Who was born by the grace of Lord Shiva

3. GunakaramKripakaram, Sushantidam-Yashachyakaram,
Nijatambuddhi-dayakam, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana,who does good and showers mercy,
Who is peace personified grants fame and gives true spiritual wisdom.

4. SadaivDhusta-Bhanjanam, Sada-sudharva-vardhanam,
Mumuksha-Bhaktaranjam,Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, who always destroys bad people,
Who always increases courage to do good and who enjoys the devotion of realised souls.

5. Suramapada-sevinam, Suramanama-gayinam,
Suramabhakti-dayinam, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, who serves the feet of Lord Rama,
Who grants us devotion to Lord Rama and always sings the name of Lord Rama.

6. Virakta-mandala-dhipam, Sadatma-vitsusevinam,
Subhakta-vrundvandanam, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana who is the chief of those who have given up ali,
Who is served by all those who are good souls and Who is saluted by crowds of great devotees

7. Vimukti-vigna-nashakam, Vimukti-bhakti-dayikam,
Maha-virakti-karakam, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, Who removes roadblocks on way to salvation,
Who Grants us devotion leading to salvation and creates us great sense of detachment.

8. Sukhemya deva madvayam, Brihut-meva-tatsvayam,
Itihi-bodhi-kamgurum, Bhajeham-anjani-sutam

I sing about the son of Anjana, who is the God who blesses us with comfort,
Who by himself is very great and is the teacher who gives us wisdom.

9. Virakti-mukti-dayakam, Imam-stavan-supavanam,
Pathantiye-samadarat-na-sansaranti-te-dhruvam

If one reads with great devotion, this holy prayer,
Which grants detachment and devotion,
Would he not be Definitely remembered with great respect?

बुधवार, 14 जून 2017

वट सावित्री व्रत 2018: जानें कथा और महत्व के बारे में

वट सावित्री व्रत

यूं तो भारतवर्ष में कर्इ व्रत-त्यौहार मनाए जाते है लेकिन इनमें से कुछ एेसे व्रत है जो आदर्श नारीत्व के प्रतीक के रूप में जाने जाते है। आैर इन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत। ये व्रत हर विवाहिता के लिए अहम माना जाता है। जिसके तहत विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए ये व्रत रखती है। हालांकि इस व्रत को लेकर एक निश्चित तिथि नहीं है। यानि कुछ पुराणों में जहां ये व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को करना बताया गया है वहीं कर्इ जगह वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को करने का विधान है। लेकिन दोनों का उदेश्य एक समान है, सौभाग्य की वृद्घि। तो आइए जानते है वट सावित्री व्रत की कथा आैर इससे जुड़े विभिन्न पहलूआें के बारे मेंः

वट सावित्री व्रत 2017 तारीख:
25 मर्इ, गुरूवार

वट सावित्री व्रत कथाः
ये कथा सावित्री आैर सत्यभाम की है। सावित्री एक संपन्न राजा की बेटी थी जबकि सत्यवान बहुत ही दरिद्रतापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा होता है क्यूंकि उसके पिता का राजपाट सब कुछ छिन लिया जाता था। उसके माता-पिता के आंखों की रोशनी भी चली जाती है। इस कारण वो एक आम इंसान की तरह जिंदगी व्यतीत करते है। जब सावित्री आैर सत्यवान के विवाह की बात चलती है तो नारद मुनि आकर सावित्री के पिता को बताते है कि वे सत्यवान के साथ अपनी पुत्री का विवाह ना करें क्यूंकि सत्यवान अल्पायु है। लेकिन इसके बावजूद सावित्री की जिद के कारण वे इन दोनों का विवाह कर देते है। नारदजी द्वारा सत्यवान की मृत्यु के लिए बताए गए दिन में जब चार दिन शेष बचते है तभी से सावित्री व्रत रखने लगती है। नियत दिन आने पर सत्यवान पेड़ काटने के लिए जंगल जाता है, तब सावित्री भी उसके साथ चल देती है। जैसे ही सत्यवान पेड़ पर चढ़ता है कि उसके सिर में असहनीय दर्द होने लगता है आैर वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट जाता है।


कुछ देर बाद साक्षात यमराज अपने दूतों के साथ वहां पहुंचते है। आैर सत्यवान के जीवात्मा को लेकर वहां से जाने लगते है, सावित्री भी उनके पीछे-पीछे लगती है। यमराज सावित्री को पीछे आने के लिए मना करते है लेकिन सावित्री कहती है कि जहां तक मेरे पति जाएंगे वहां तक मुझे जाना चाहिए। इस पर यमराज प्रसन्न होते है आैर सावित्री को काेर्इ वरदान मांगने को कहते है सावित्री उनसे अपने सास-ससुर की नेत्र-ज्योति वापिस मांगती है। इस पर यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ने लगते है। लेकिन फिर भी सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती रहती है, इस पर यमराज उसे फिर से वर मांगने को कहते है तो सावित्री कहती है कि मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए। यमराज तथास्तु कहकर उसे लौट जाने को कहते है। लेकिन फिर भी सावित्री उनके पीछे-चलती रहती है। यमराज उसे एक आैर वर मांगने को कहते है तो सावित्री कहती है कि मैं सत्यवान के साै पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। सावित्री की मनोकामना सुनकर यमराज का दिल पिघल जाता है आैर वे सावित्री की मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद देते है। इसके बाद सावित्री उसी वट वृक्ष्र के पास वापिस लौटती है, जहां सत्यवान में पुनः प्राणों का संचार होता है आैर वो उठकर बैठ जाता है। इस तरह सावित्री को उसका सुहाग वापिस मिल जाता है आैर वो उसके साथ सुखद ग्रहस्थ जीवन बिताती है।


वट सावित्री व्रत की पूजा विधिः

सबसे पहले व्रत करने वाली महिलाएं सुबह उठकर नित्य दिनचर्या से निवृत्त होकर शुद्घ जल से स्नान करें। जिसके बाद नए वस्त्र धारणकर सोलह श्रृंगार करें। फिर वट वृक्ष के नीचे जाकर आसपास की जगह को साफ आैर स्वच्छ कर वहां सत्यवान आैर सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। जिसके बाद सिंदूर, चंदन, पुष्प, रोली, अक्षत इत्यादि प्रमुख पूजन सामग्री से पूजन करें। फिर लाल कपड़ा, फल आैर प्रसाद चढ़ाए। इसके पश्चात धागे को बरगद के पेड़ में बांधकर जितना  संभव हो सकें उतनी बार परिक्रमा करें। फिर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें आैर ब्राहमण या जरूरतमंद को दान करें। जिसके बाद अपने-अपने घर लौट जाए आैर घर पहुंचकर पति का आशीर्वाद लें। व्रत शाम को खोलें।


वट वृक्ष की पूजा का महत्वः

भारतीय संस्कृति में कर्इ वृक्षों में भगवान का वास माना जाता है आैर इनकी पूजा विशिष्ट फल देने वाली मानी जाती है। इन्हीं में से एक है ‘बरगद का पेड़’ जिसे ‘वट वृक्ष’ भी कहा जाता है। पुराणों में वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का वास माना गया है। इसके नीचे बैठकर किसी भी प्रकार का पूजन करने, कथा सुनने या कोर्इ अन्य धार्मिक कार्य करने से शुभ फल मिलते है। इस वृक्ष में लटकी जटाआें को शिव की जटाएं मानी जाती है।

॥ सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्रम् ॥

विनियोगः -

ॐ श्री सूर्यस्तवराजस्तोत्रस्य श्रीवसिष्ठ ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । 
श्रीसूर्यो देवता । सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः ।

 ऋष्यादिन्यासः - 
श्रीवसिष्ठऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीसूर्यदेवाय नमः हृदि । सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगापशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ । 

ध्यानं - 

ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं द्विभुजं रक्तवाससे । 
दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्मादिभिः अलङ्कृतम् ॥ 

मानस पूजनं एवं स्तोत्रपाठः - 

ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः । 
लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षु ग्रहेश्वरः ॥ 
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा । 
तपनः तापनः चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥ 
गभस्तिहस्तो ब्रध्नश्च सर्वदेवनमस्कृतः । 
एकविंशतिः इत्येष स्तव इष्टः सदा मम ॥ 

॥ फलश्रुतिः ॥ 

 श्रीः आरोग्यकरः चैव धनवृद्धियशस्करः । 
स्तवराज इति ख्यातः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ 
यः एतेन महाबहो द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये । 
स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥ 
कायिकं वाचिकं चैव मानसं यच्च दुष्कृतम् । 
एकजप्येन तत् सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः ॥ 
एकजप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च । 
बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च ॥ 
अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाति प्रदक्षिणे । 
पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः ॥  
एवं उक्तवा तु भगवानः भास्करो जगदीश्वरः । 
आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥ 
 साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः । 
पूतात्मा नीरुजः श्रीमान् तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान् ॥ 

 भगवान् सूर्यनामावली 

१. विकर्तन २. विवस्वान् ३. मार्तण्ड ४. भास्कर ५. रवि ६. लोकप्रकाशक ७. श्रीमान् ८. लोकचक्षु ९. ग्रहेश्वर १०. लोकसाक्षी ११. त्रिलोकेश १२. कर्ता १३. हर्ता १४. तमिस्रहा १५. तपन १६. तापन १७. शुचि १८. सप्ताश्ववाहन १९. गभस्तिहस्त २०. ब्रघ्न ( ब्रह्मा ) २१. सर्वदेवनमस्कृत इति ।

पुष्य नक्षत्र पर करें ये काम, कार्य सिद्धि के साथ मिलेगी स्थायी समृद्धि

हिन्दू धर्म ग्रंथों में पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभकारक नक्षत्र कहा जाता है। पुष्य का अर्थ होता है कि पोषण करने वाला और ऊर्जा-शक्ति प्रदान करने वाला नक्षत्र। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति हमेशा ही लोगों की भलाई व सेवा करने के लिए तत्पर रहते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक अपनी मेहनत और साहस के बल पर जिंदगी में तरक्की प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस शुभ दिन पर संपत्ति और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी का जन्म हुआ था। जब भी गुरुवार अथवा रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र आता है तो इस योग को क्रमशः गुरु पुष्य नक्षत्र और रवि पुष्य नक्षत्र के रूप में जाना जाता है। यह योग अक्षय तृतीया, धन तेरस, और दिवाली जैसी धार्मिक तिथियों की भांति ही शुभ होता है। कहते हैं कि इस दिन माँ लक्ष्मी घर में बसती है और वहां एक लंबे समय तक विराजती है इसीलिए, इस यह घड़ी पावन कहलाती है। पुष्य नक्षत्र का स्वभाव फलप्रदायी और ध्यान रखने वाला है। पुष्य नक्षत्र के दौरान किए जाने वाले कार्यों से जीवन में समृद्धि का आगमन होता है। इस दिन ग्रहों के अनुकूल स्थितियों में भ्रमण कर रहे होने से वे आपके जीवन में शांति, संपत्ति और स्थायी समृद्धि लेकर आते हैं। क्या वर्ष 2017 में आपके जीवन में समृद्घि रहेगी ? इसका जवाब जानने के लिए खरीदें 2017 विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट।  

वैदिक ज्योतिष में महात्मय:
हमारे वैदिक ज्योतिष में बारह राशियों में समाविष्ट होने वाले 27 नक्षत्रों में आठवें नक्षत्र ‘पुष्य’ को सबसे शुभ नक्षत्र कहते हैं। इसी नक्षत्र में गुरु उच्च का होता है। देवों के आशीर्वाद से पुरस्कृत इस नक्षत्र के देवता बृहस्पति और दशा स्वामी शनि हैं। कर्क राशि के अंतर्गत समाविष्ट होने से इस नक्षत्र के राशिधिपति चंद्र हैं। इस प्रकार से गुरु व चंद्र के शुभ संयोग इस नक्षत्र में होने से किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए पुष्य नक्षत्र श्रेष्ठ माना जाता है। क्या आपकी जन्मकुंडली में महत्वपूर्ण ग्रह अच्छी स्थिति में विराजमान है ? इसका जवाब जानने के लिए खरीदें जन्मपत्री रिपोर्ट।

जीवन में समृद्धि का आगमनः
पुष्य नक्षत्र का दशा स्वामी शनि होने से इस नक्षत्र के दरमियान घर में आयी संपत्ति या समृद्धि चिरस्थायी रहती है। पुष्य नक्षत्र में किए गए कामों को हमेशा सफलता व सिद्धि मिलती है। इसलिए, विवाह को छोड़कर हर एक कार्यों के लिए पुष्य नक्षत्र को शुभ माना जाता है। दिवाली के दिनों में चोपड़ा खरीदने के लिए व्यापारीगण पुष्य नक्षत्र को विशेष महत्व देते हैं। इसके अलावा, वर्ष के दौरान भी पुष्य नक्षत्र में जब गुरु पुष्यामृत योग बन रहा हो तब सोने, आभूषण और रत्नों को खरीदने की प्रथा सदियों से प्रचलित है।

पुष्य नक्षत्र में किए जाने वाले मांगलिक कार्य:

– इस मंगलकर्ता नक्षत्र के दौरान घर में आयी संपत्ति या समृद्धि चिरस्थायी रहती है।
– ज्ञान और विद्याभ्यास के लिए पावन दिन।
– इस दिन आध्यात्मिक कार्य किए जा सकते हैं।
– मंत्रों, यंत्रों, पूजा, जाप और अनुष्ठान हेतु शुभ दिन।
– माँ लक्ष्मी की उपासना और श्री यंत्र की खरीदी करके जीवन में समृद्धि ला सकते हैं।
– इस समय के दौरान किए गए तमाम धार्मिक और आर्थिक कार्यों से जातक की उन्नति होती है।

गुरु,शनि और रवि पुष्य नक्षत्र :
गुरुवार और रविवार के दिन पड़ने वाले पुष्य योग को गुरु पुष्य और रवि पुष्य नक्षत्र कहते हैं। गुरु पुष्य और रवि पुष्य योग सबसे शुभ माने जाते हैं। इस समय के दौरान छोटे बालकों के उपनयन संस्कार और उसके बाद सबसे पहली बार विद्याभ्यास के लिए गुरुकुल में भेजा जाता है। इसका ज्ञान के साथ अटूट संबंध है एेसा कह सकते हैं। इसके अलावा, शनि व गुरु के संबंध को उत्तम ज्ञान की युति कहते हैं। पंचाग को देखकर हर एक कार्य करना चाहिए।

पुष्य नक्षत्रः मांगलिक कार्यों से शुभ फलों की प्राप्ति का पावन पर्वः

– इस दिन पूजा या उपवास करने से जीवन के हर एक क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होती है।
– कुंडली में विद्यमान दूषित सूर्य के दुष्प्रभाव को घटाया जा सकता है।
– इस दिन किए कार्यों को सिद्धि व सफलता मिलती है।
– धन का निवेश लंबी अवधि के लिए करने पर भविष्य में उसका अच्छा फल प्राप्त होता है।
– काम की गुणवत्ता और असरकारकता में भी सुधार होता है।
– इस शुभदायी दिन पर महालक्ष्मी की साधना करने से उसका विशेष व मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

पुष्य नक्षत्र को ब्रह्याजी का श्राप मिला था, इसलिए यह नक्षत्र शादी-विवाह के लिए वर्जित माना गया है। पुष्य नक्षत्र में दिव्य औषधियों को लाकर उनकी सिद्धि की जाती है। जीवन में संपत्ति और समृद्धि को आमंत्रित करने के लिए पुष्य नक्षत्र व्यक्ति को पूरा अवसर प्रदान करता है। इस दिन किए गए सभी मांगलिक कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होते हैं।

शुक्रवार, 2 जून 2017

ऐसे करेंग भोजन तो होगी उन्नति

🍎 ऐसे करेंग भोजन तो होगी उन्नति

पुराणों के अनुसार अन्न में अन्नपूर्णा मां का वास माना गया है। सनातन धर्म में कोई भी हिंदू भोजन खाने से पूर्व उसे प्रणाम करता है। ताकि जो भोजन करने जा रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिए हितकर हो। 
जो व्यक्ति प्रतिदिन भोजन से पहले गौ माता को ग्रास अर्पित करता है, वह सत्यशील प्राणी श्री, विजय और ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रात:काल उठने के बाद नित्य गौ माता के दर्शन करता है, उसकी अकाल मृत्यु कभी हो ही नहीं सकती, यह बात महाभारत में बहुत ही प्रामाणिकता के साथ कही गई है। 

हिंदू धर्म के अनुसार मानव शरीर वायु, अग्नि, जल, आकाश और पृथ्वी से मिलकर बना है और हाथों की अंगुलियां इन तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब इन पांचों तत्वों के माध्यम से भोजन ग्रहण किया जाता है अर्थात चम्मच की बजाय हाथ से खाना खाया जाता है तो ये हमारे खाने में अवशोषित होकर हमें निरोगी बनाते हैं।

जो कोई प्रतिदिन पूरे संवत्-भर मौन रह कर भोजन करते हैं, वे हजारों-करोड़ों युगों तक स्वर्ग में पूजे जाते हैं अर्थात जो व्यक्ति संतोष के साथ जो मिले उसी पर संतुष्ट रहता है, उसे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। उसे न तो कोई दुख होता है और न ही कोई कष्ट। 

प्राचीन परम्परा के अनुसार खाना हमेशा जमीन पर पालथी मारकर ही खाना चाहिए। ऐसा करने से मोटापा, अपच, कब्ज, एसीडीटी आदि पेट संबंधी बीमारियों में भी राहत मिलती है। खड़े होकर अथवा मेज कुर्सी पर बैठकर खाना खाने से शरीर में अनेक विकार पैदा हो जाते हैं। इस बात को हमेशा याद रखें कि भोजन करने के बाद क्रोध नहीं करना चाहिए और न ही भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करना चाहिए, इससे स्वास्थ्य को नुकसान होता है।🍋