मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं | Dharma is not 'Religion'

धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं बिलकुल भी नहीं है |
धर्म के प्रति एक भ्रान्ति इसके अंग्रेजी के अनुवाद ने उत्त्पन्न कर दी, अंग्रेजी में धर्म को 'रिलीजन' कहा गया, वास्तव में रिलिजन शब्द से जो ध्वनि निकलती है उससे संकीर्णता का आभास होता है|
'धर्म' जब से 'रिलीजन' माना जाने लगा तो इसका अर्थ यही लगाया जाने लगा कि यह एक विशेष प्रकार की पूजा-आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाला तथा एक प्रकार के मार्ग पर यंत्रवत चलने वाला तथा संप्रदाय विशेष है|
रिलीजन शब्द से एक ऐसे संकुचित व अपूर्ण भाव का बोध होता है की उसमें धर्म तत्त्व समाहित नहीं होता |
धर्म का अनिवार्य तत्त्व उसकी उदारता, महानता, सार्वभौम सत्ता में निहित है जिसका लक्ष्य ही " सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया " है जबकि रिलीजन में इस तरह के भाव प्रकट नहीं होते|
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म (५३) - १.४

Dharma is not translation of 'Religion'
A misconception was formed about Dharma when the English word 'Religion' was chosen to represent its meaning. The word 'religion' gives off a feeling of insular traditionalism.
Mistaking Dharma to be merely religion has led to the misunderstanding that Dharma is just a community of people who have faith in a specific set of prayer rituals that they mechanically follow. This specificity became the essence of Dharma.
The word religion emanates a sense of constriction and incompleteness, too restrictive to capture the essence of Dharma.
Generosity, greatness, universality and catholicity are the essential elements of Dharma, as expressed aptly by Dharma's goal of "May all be content, may all be free from all limitations". The word religion does not evoke similar sentiments.
- Pt. Shriram Sharma Acharya
From the Vangmay 53 "Dharma tattva ka darshan aur marm" page - 1.4

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

मधुराष्टकं


अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥१॥

अधर, वदन नयना अति मधुरा, स्मित मधुर, हृदय अति मधुरा
चाल मधुर, सब कुछ मधु मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

वचनं मधुरं चरितं मधुरं, वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥२॥

चरित मधुर, वचनं अति मधुरा, भेष मधुर, वलितं अति मधुरा
चाल मधुर अति, भ्रमण भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

वेणुर्मधुरो रेनुर्मधुरः, पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥३॥

मधुरं वेणु , चरण रज मधुरा, पाद पाणि दोनों अति मधुरा
मित्र मधुर मधु, नृत्यं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥४॥

गायन मधुर, पीताम्बर मधुरा, भोजन मधुरम, शयनं मधुरा
रूप मधुरतम, तिलकं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥५॥

करम मधुरतम, तारण मधुरा, हरण, रमण दोनों अति मधुरा
परम शक्तिमय मधुरम मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गुंजा मधुरा माला मधुरा, यमुना मधुरा वीचीर्मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥६॥

कुसुम माल, गुंजा अति मधुरा, यमुना मधुरा, लहरें मधुरा
यमुना जल, जल कमल भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गोपी मधुरा लीला मधुरा, युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥७॥

मधुर गोपियाँ, लीला मधुरा, मिलन मधुर भोजन अति मधुरा
हर्ष मधुरतम, शिष्टं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फ़लितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥८॥

ग्वाले मधुरम, गायें मधुरा, अंकुश मधुरम, सृष्टिम मधुरा
दलितं मधुरा, फलितं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

- श्री श्री वल्लभाचार्य

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥
(हरिभक्तिविलस ३।३७, गरुड़ पुराण)

Whether all places are permeated with purity or with impurity,
whosoever remembers the lotus-eyed Lord (Vishnu, Rama, Krishna) gains inner and outer purity.

चाहे (स्नानादिक से) पवित्र हो अथवा (किसी अशुचि पदार्थ के स्पर्श से) अपवित्र हो, (सोती, जागती, उठती, बैठती, चलती) किसी भी दशा में हो, जो भी कमल कमल नयनी (विष्णु, राम, कृष्ण) भगवान का स्मरण मात्र से वह (उस समय) बाह्म (शरीर) और अभ्यन्तर (मन) से पवित्र होता है |

महाकालेश्वर मंदिर

महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है।

मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। सावन में तो इसकी छटा देखते ही बनती है। कांवड़ियों के जयकारों और मंदिरों के घंटो से ऐसा प्रतित होता है कि जैसे हम किसी शिवलोक में आ गए हैं।

बम बम भोले के जयकारे

इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन 1690 ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 नवंबर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया।

इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन 1731 से 1801 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं - पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

सावन में लगता है कावड़ियों का मेला

महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था।

लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा 1980 के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया। हाल ही में इसके 198 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है।कहते हैं भोलेनाथ सब की सुनते हैं, इसलिए महाकालेश्वर मंदिर से कोई बी खाली हाथ नहीं लौटता।

कैलाश मानसरोवर

मानसरोवर तिब्बत में स्थित एक झील है ।

यह झील लगभग 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैला हुआ है । इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम मे रक्षातल झील है । यह समुद्रतल से लगभग 4556 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । इसकी परिमिति लगभग 88 किलोमीटर है और औसत गहराई 90 मीटर ।

हिन्दू धर्म में इसे लिए पवित्र माना गया है । इसके दर्शन के लिए हज़ारों लोग प्रतिवर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में भाग लेते है । हिन्दू विचारधारा के अनुसार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुआ था । संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - मन का सरोवर । यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।

अमरनाथ मंदिर के बाद कैलाश मानसरोवर को भगवान शिव का धाम माना गया है. अमरनाथ मंदिर के दर्शनों की तरह यह स्थल भी बेहद दुर्गम स्थान पर स्थित है. मानसरोवर को दूसरा कैलाश पर्वत कहा गया है. भगवान शिव के निवास स्थल के नाम से प्रख्यात यह स्थल अपनी अपरम्पार महिमा के लिये प्रसिद्ध है. यह पर्वत कुल मिलाकर 48 किलोमीटर में फैला हुआ है. कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यधिक कठिन यात्राएं में से एक यात्रा मानी जाती है. इस यात्रा का सबसे अधिक कठिन मार्ग भारत के पडौसी देश चीन से होकर जाता है.
यहां की यात्रा के विषय में यह कहा जाता है, कि इस यात्रा पर वहीं लोग जाते है, जिसे भगवान भोलेनाथ स्वयं बुलाते है. यह यात्रा प्रत्येक वर्ष मई से जून माह के मध्य अवधि में होती है. कैलाश मानसरोवर यात्रा की अवधि 28 दिन की होती है.
कैलाश मानसरोवर स्थल धरती पर किसी स्वर्ग से कम नहीं है. इस स्थल के विषय में यह मान्यता है, कि जो व्यक्ति इस स्थल का पानी पी लेता है. उसके लिये भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में प्रवेश मिल जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी ने मानसरोवर का निर्माण स्वयं किया था.
माता के 51 शक्तिपीठों के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का एक हाथ गिरा था. जिसके बाद ही यह झील बनी है. तभी से यह स्थान मात के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.
कैलाश मानसरोवर मंदिर समुद्र स्थल से 4 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है. इतनी ऊंचाई पर होने के कारण यहां के गौरी नामक कुण्ड में सदैव बर्फ जमी रहती है. इस मंदिर के दर्शनों को आने वाले तीर्थयात्री इस बर्फ को हटाकर इस कुंड में  स्नान करना विशेष रुप से शुभ मानते है.  यहां भगवान शिव बर्फ के शिवलिंग के रुप में विराजित है.    इस स्थान से भारत में जाने वाली कई महत्वपूर्ण नदियां निकलती है. कैलाश मानसरोवर के जल का पानी पीकर, गौरी कुण्ड में स्थान अवश्य किया जाता है.
इस धार्मिक स्थल की यात्रा करने वाले यात्रियों में न केवल हिन्दू धर्म के श्रद्वालु आते है, बल्कि यहां पर बौद्ध व अन्य धर्म के व्यक्ति भी कैलाश मानसरोवर में स्थित भगवान शिव के दर्शनों के लिये आते है, और पुन्य कमा कर जाते है.    
इसी स्थान पर एक ताल है, जो राक्षस ताल के नाम से विख्यात है. इस ताल से जुडी एक पौराणिक कथा प्रचलित है, कि यहां पर रावण ने भगवान शिव कि आराधना की थी. रावण राक्षस कुल के थें. इसी कारण इस ताल का नाम "राक्षस ताल" पडा है.
कैलाश मानसरोवर के विषय में कहा जाता है, कि देव ब्रह्मा जी ने सृ्ष्टि की रचना इसी स्थान पर की थी. यहां पर गंगा नदी कैलाश पर्वत से निकलते हुए चार नदियों का रुप लेती है. जिसके उसके चार नाम हो जाते है. मानसरोवर की यात्रा का दृ्श्य बडा ही मनोरम है. यहां पर प्रकृ्ति का रंग गहरा नीला और बेह्द बर्फीला हो जाता है.

कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने वाले श्रद्वालु यहां आकर कैलाश जी की परिक्रमा अवश्य करते है. कैलाश की परिक्रम करने के बाद मानसरोवर की परिक्रमा की जाती है. यहां के सौन्दर्य को देख कर सभी को इस तथ्य पर विश्वास हो गया कि इस स्थान को ब्रह्माण्ड का मध्य स्थान क्यों कहा जाता है.

सोमवार, 24 सितंबर 2012

सती शिव की कथा


दक्ष प्रजापति की अनेको पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं किन्तु  दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे, उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो शक्ति-संपन्न हो। सर्व-विजयिनी हो। दक्ष एक ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म लूगीं, मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी।' फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहाँ जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं। उन्होंने बाल्यकाल में ही कई ऐसे अलौकिक कृत्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय की लहरों में डूब जाना पड़ा।

जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, 'सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदिशक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं।' दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। यद्यपि भगवान शिव के दक्ष के जामाता थे, किंतु एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध पैदा हो गया। *घटना इस प्रकार थी— एक बार ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र थे। भगवान शिव भी एक ओर बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान शिव को किसी के मान और किसी के अपमान से क्या मतलब? वे तो समदर्शी हैं। उन्हें तो चारों ओर अमृत दिखाई पड़ता है। जहां अमृत होता है, वहां कडुवाहट और कसैलेपन का क्या काम?

भगवान शिव कैलाश में दिन-रात राम-राम कहा करते थे। सती के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो उठी। उन्होंने अवसर पाकर भगवान शिव से प्रश्न किया, 'आप राम-राम क्यों कहते हैं? राम कौन हैं?' भगवान शिव ने उत्तर दिया, 'राम आदि पुरुष हैं, स्वयंभू हैं, मेरे आराध्य हैं। सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं।' किंतु सती के कंठ के नीचे बात उतरी नहीं। वे सोचने लगीं, अयोध्या के नृपति दशरथ के पुत्र राम आदि पुरुष के अवतार कैसे हो सकते हैं? वे तो आजकल अपनी पत्नी सीता के वियोग में दंडक वन में उन्मत्तों की भांति विचरण कर रहे हैं। वृक्ष और लताओं से उनका पता पूछते फिर रहे हैं। यदि वे आदि पुरुष के अवतार होते, तो क्या इस प्रकार आचरण करते? सती के मन में राम की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। सीता का रूप धारण करके दंडक वन में जा पहुंची और राम के सामने प्रकट हुईं। भगवान राम ने सती को सीता के रूप में देखकर कहा, 'माता, आप एकाकी यहाँ वन में कहां घूम रही हैं? बाबा विश्वनाथ कहां हैं?' राम का प्रश्न सुनकर सती से कुछ उत्तर देते न बना। वे अदृश्य हो गई और मन ही मन पश्चाताप करने लगीं कि उन्होंने व्यर्थ ही राम पर संदेह किया। राम सचमुच आदि पुरुष के अवतार हैं। सती जब लौटकर कैलाश गईं, तो भगवान शिव ने उन्हें आते देख कहा, 'सती, तुमने सीता के रूप में राम की परीक्षा लेकर अच्छा नहीं किया। सीता मेरी आराध्या हैं। अब तुम मेरी अर्धांगिनी कैसे रह सकती हो! इस जन्म में हम और तुम पति और पत्नी के रूप में नहीं मिल सकते।' शिव जी का कथन सुनकर सती अत्यधिक दुखी हुईं, पर अब क्या हो सकता था। शिव जी के मुख से निकली हुई बात असत्य कैसे हो सकती थी? शिव जी समाधिस्थ हो गए। सती दुख और पश्चाताप की लहरों में डूबने उतारने लगीं।
उन्हीं दिनों सती के पिता कनखल में बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को आमन्त्रित किया था, किंतु शिव जी को आमन्त्रित नहीं किया था, क्योंकि उनके मन में शिव जी के प्रति ईर्ष्या थी। सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता ने बहुत बड़े यज्ञ की रचना की है, तो उनका मन यज्ञ के समारोह में सम्मिलित होने के लिए बैचैन हो उठा। शिव जी समाधिस्थ थे। अतः वे शिव जी से अनुमति लिए बिना ही वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर चली गईं।

कहीं-कहीं सती के पितृगृह जाने की घटना का वर्णन एक दूसरे रूप में इस प्रकार मिलता है— एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं?'
भगवान शकंर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता ने यज्ञ की रचना की है। देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।'
सती ने दूसरा प्रश्न किया, 'क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?'
भगवान शंकर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?'
सती मन ही मन सोचने लगीं, फिर बोलीं, 'यज्ञ के अवसर पर अवश्य मेरी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं,हो सकता है वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'हां, विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती है। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता है।' किंतु सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी कर दिया, उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं, किंतु उनसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा,'तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो, वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर है। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है।' दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं, ‘उन्होंने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता है? अब तो आ ही गई हूं।'
पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, 'पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है। आपने उनका भाग क्यों नहीं दिया?' दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया, 'मै तुम्हारे पति कैलाश को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा।
सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा,'ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं, मुझे धिक्कार है। देवताओ, तुम्हें भी धिक्कार है! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता है। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नरक में जाना पड़ता है। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।' सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक देया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा। वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए।
भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हिए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम! पाहिमाम! भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती है। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है, वंदनीय बना दिया है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

वेद- Veda

वेद(४)

1. ऋग्वेद,
2. यजुर्वेदवेद,
3. सामवेद,
4.अथर्ववेद
वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि पहले मुद्रण की व्यवस्था न होने से इनको एक दुसरे से सुन- सुनकर याद रखा गया इसप्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक/श्रुति = श्रवण परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

वेदों का प्रधान लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान देना ही है। अतः वेद में कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड - इन दोनों विषयों का सर्वांगीण निरुपण किया गया है। वेदों का प्रारम्भिक भाग कर्मकाण्ड है और वह ज्ञानकाण्ड वाले भाग से अधिक है। जिन अधिकारी वैदिक विद्वानों को यज्ञ कराने का यजमान द्वारा अधिकार प्राप्त होता है, उनको ‘ऋत्विक’ कहते हैं। श्रौतयज्ञ में इन ऋत्विकों के चार गण हैं। (१) होतृगण, (२) अध्वर्युगण, (३) उद्गातृगण तथा (४) ब्रह्मगण। उपर्युक्त चारों गणों के लिये उपयोगी मन्त्रों के संग्रह के अनुसार वेद चार हुए हैं।

(१) ऋग्वेद- इसमें होतृवर्ग के लिये उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘ऋक्’ संज्ञक (पद्यबद्ध) मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ऋग्वेद हुआ। इसमें होतृवर्ग के उपयोगी गद्यात्मक (यजुः) स्वरुप के भी कुछ मन्त्र हैं।

(२) यजुर्वेद- इसमें यज्ञानुष्ठान सम्बन्धी अध्वर्युवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें ‘गद्यात्मक’ मन्त्रों की अधिकता के कारण इसका नाम ‘यजुर्वेद’ है। इसमें कुछ पद्यबद्ध, मन्त्र भी हैं, जो अध्वर्युवर्ग के उपयोगी हैं। यजुर्वेद के दो विभाग हैं- (क) शुक्लयजुर्वेद और (ख) कृष्णयजुर्वेद।

(३) सामवेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसमें गायन पद्धति के निश्चित मन्त्र होने के कारण इसका नाम सामवेद है।

(४) अथर्ववेद- इसमें यज्ञानुष्ठान के ब्रह्मवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। अथर्व का अर्थ है कमियों को हटाकर ठीक करना या कमी-रहित बनाना। अतः इसमें यज्ञ-सम्बन्धी एवं व्यक्ति सम्बन्धी सुधार या कमी-पूर्ति करने वाले मन्त्र भी है। इसमें पद्यात्मक मन्त्रों के साथ कुछ गद्यात्मक मन्त्र भी उपलब्ध है। इस वेद का नामकरण अन्य वेदों की भाँति शब्द-शैली के आधार पर नहीं है, अपितु इसके प्रतिपाद्य विषय के अनुसार है। इस वैदिक शब्दराशि का प्रचार एवं प्रयोग मुख्यतः अथर्व नाम के महर्षि द्वारा किया गया। इसलिये भी इसका नाम अथर्ववेद है।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

शिव शून्य हैं


प्रायः हम प्रकाश को सत्य, ज्ञान , शुभ, पून्य तथा सात्विक शक्तियों का द्योतक समझते हैं तथा अंधकार की तुलना अज्ञान, असत्य जैसे अवगुणों से करते हैं| फिर शिव "रात्रि" क्यों? क्यों शिव को अंधकार पसंद है? क्यों महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए सर्वाधिक महत्व रखता है?

वस्तुतः अंधकार की तुलना अज्ञान तथा अन्य असात्विक गुणों से करना ही सबसे बडी भ्रांति है| वास्तव में अंधकार एवं प्रकाश एक दु्सरे के पुरक हैं जैसे शिव और उनकी सृष्टी | अंधकार शिव हैं, प्रकाश सृष्टी | जो भी हम देखते हैं … धरती, आकाश, सूर्य, चंद्र, ग्रह नक्षत्र, जिव, जंतु, वृक्ष, पर्वत, जलाशय, सभी शिव की सृष्टी हैं, जो नहीं दिखता है वह शिव हैं| जिस किसी का भी श्रोत होता है, आदि होता है, उसकी एक निरधारित आयू होती है तथा उसका अंत भी होता है| प्रकाश का एक श्रोत होता है | प्रकाशित होने के लिए श्रोत स्वयं को जलता है तथा कुछ समय के उपरांत उसकी अंत भी होता है| यह महत्वपूर्ण नहीं है कि प्रकाश का श्रोत क्या है, वह सुर्य सामान विशाल है या दीपक सामान छोटा, अथवा उसकी आयू कितनी है| महत्वपूर्ण यह है कि उसकी एक आयू है| क्योंकि प्रकाश का श्रोत होता है, श्रोत के आभाव में प्रकाश का भी आभाव हो जाता है| आँख के बंद कर लेने से अथवा अन्य उपायों से व्यवधान उत्पन्‍‌न कर पाने कि स्थिति में प्रकाश आलोपित हो सकता है| क्योंकि प्रकाश कृतृम है|

अंधकार अनादि है, अनंन्त है, सर्वव्यापी है| अंधकार का कोई श्रोत नहीं होता अतः उसका अंत भी नहीं होता| कृतृम उपचारों से प्रकाश की उपस्थिति में हमें अंधकार के होने का आभास नहीं होता, पर जैसे ही प्रकाश की आयू समाप्त होती है हम अंधकार को स्थितिवत पाते हैं| अंधकार का क्षय नहीं होता| वह अक्षय होता है| अंधकार स्थायी है| अंधकार शिव तुल्य है|

अंधकार को प्रायः अज्ञान का पार्याय भी गिना जाता है| वास्तव में प्रकाश को हम ज्ञान का श्रोत मानते हैं क्योंकि प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता है| पर अगर ध्यान दिया जाय तो प्रकाश में हम उतना ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जितना की प्रकाश की परीधि| विज्ञान प्रकाश है| यही कारण है कि जो विज्ञान नहीं देख सकता उसे वह मानता भी नहीं है| वह तब तक किसी तथ्य को स्वीकार नहीं करता जब तक वह उसके प्रकाश की परीधि में नहीं आ जाती| पर यह तो सिद्ध तथ्य है कि विज्ञान अपने इस विचारधारा के कारण हर बार अपनी ही जीत पर लज्जित हुआ है| क्योंकि हर बार जब विज्ञान ने कुछ ऐसा नया खोजा है जिसे खोज के पहले उसने ही नकारा था तो वस्तुतः उसने स्वयं की विचारधारा की खामियों को ही उजागर किया है| हर खोज विज्ञान की पूरानी धारणा को गलत सिद्ध करती हूई नईं धारणा को प्रकाशित करती है जिसे शायद कूछ समयोपरांत कोई नईं धारणा गलत सिद्ध कर दे| क्या यह भ्रातीं मृगतृष्णा (Mirage) नहीं है? स्मरण रहे मृगतृष्णा (Mirage) प्रकाश अथवा दृष्टी का ही दोष है| अंधकार में देखना कठीन अवश्य है पर उसमें दृष्टी दोष नहीं होता| प्रकाश में देखने में अभ्यस्त हमारी आँखें अंधकार मे सही प्रकार देख नहीं सकतीं पर अंधकार में देखने में अभ्यस्त आँखें प्रकाश में स्वतः ही देख सकती हैं| निर्णय?

जब हमरी मंजिल भौगोलिक होती है नजदीक होती है तो प्रकाश सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है|

सृष्टी विस्तृत है| हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं|

सहायक होता है| पर हिन्दू धर्म, तथा प्रायः हर धर्म एवं आस्था के अनुसार मानव जाति की सर्वोच्च ईच्छा मोक्ष (Salvation) होती है| मोक्ष क्या है? ईच्छाओं का अन्‍त | जब कोई ईच्छा नहीं, कोई मंजिल नहीं कोई जरूरत नहीं तो वहां क्या होगा| अंधकार| सर्वव्यापी एवं अनन्त अंधकार| तब हम शिव को प्राप्त कर लेते हैं| यह तो विज्ञान भी मानेगा की अनेक महत्वपूर्ण खोज स्वपन में हुए हैं | तथा वहाँ अंधकार का सामराज्य है| सृष्टी विस्तृत है|

हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है| पर प्रश्‍न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं| ईश्वर एक हैं| वे तीन त्रिदेवों अथवा ३३ करोड देवताओं में ही नहीं, अपितू संपूर्ण सृष्टी के कण कण में व्याप्‍त हैं| वे हमारे नश्‍‍वर शरीर के अन्दर की आत्मा हैं| वे हमारे सदविचार हैं|

ब्रह्मा कर्ता हैं, विष्णू कार्य तथा कार्यफल हैं, शिव कारण हैं| त्रिदेव एक वृक्ष के सामन हैं| ब्रह्म उस वृक्ष के तना हैं, विष्णु उस वृक्ष के विस्तार है, डालिया, पत्ते, पूष्प तथा फल सामान हैं| सदाशिव उस वृक्ष के जड हैं| शिव जी की आरती इसी तत्व को संबोधित है| वास्तव में ये त्रिगूण शिव जी की आरती है जिसमे स्पष्ट शब्दों में उलेखित है …

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका|
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका|