मंगलवार, 6 सितंबर 2016

श्री हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की।
जाके बल से गिरिवर कांपै। रोग दोष जाके निकट न झांपै।
अंजनिपुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई।
दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।
लंका जारि असुर संहारे। सीतारामजी के काज संवारे।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्राण उबारे।
पैठि पताल तोरि जम कारे। अहिरावण की भुजा उखारे।
बायें भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।
सुर नर मुनि आरती उतारे। जय जय जय हनुमान उचारे।
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।
जो हनुमान जी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै।



हनुमान चालीसा

बुधवार, 16 मार्च 2016

balamukund astakam

balamukund astakam

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तं
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
karAravindena padAravindam mukhAravinde viniveshayantam
vaTasya patrasya puTe shayAnam bAlam mukundam manasA smarAmi 

संहृत्य लोकान्-वटपत्रमध्ये शयनं-आद्यन्तविहीन रूपम्
सर्वेश्र्वरम् सर्वहितावतारं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
samhrutya lokAn-vaTapatramadhye shayanam-AdyantavihIna rUpam
sarveshwaram sarvahitAvatAram  bAlam mukundam manasA smarAmi 

इन्दीवर-श्यामल-कोमलाङ्गं इन्द्रादि-देवार्चित-पादपद्मं
संतानकल्प-द्रुममं-आश्रितानां बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
indIra-shyAmala-komalAngam indrAdi-devArchita-pAdapadmam
santAnakalpa-drumam-AshritAnAm bAlam mukundam manasA smarAmi  

लम्बालकं लंबित-हारयष्टिं शृङ्गारलीलाङ्कित-दन्तपङ्क्तिं
बिम्बाधरं चारुविशाल-नेत्रं   बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
lambAlakam lambita-hArayaShTim shrungAra-leelAnkita-dantapanktim
bimbAdharam chAruvishAla-netram bAlam mukundam manasA smarAmi  

  शिक्ये निधायाद्य-पयोदधीनि बहिर्गतायं व्रजनायिकायां
भुक्त्वा यथेष्टं कपटेन सुप्तं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
 shikye nidhAyAdya-payodadhIni bahirgatAyam vrajanAyikAyAm
bhuktvA yatheShTam kapaTena suptam bAlam mukundam manasA smarAmi  

कलिन्दजान्त-स्थितकालियस्य फणाग्ररङ्गे नटनप्रियन्तं
तत्पुच्छहस्तं शरदिन्दुवक्त्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
kalindajAnta-sthitakAliyasya phaNAgrarange naTanapriyantam
tatpucchahastam sharadinduvaktram  bAlam mukundam manasA smarAmi  

उलूखले बद्धं-उदारशौर्यम् उत्तुङ्ग-युग्मार्जुन-भन्गलीलं
उत्पुल्ल-पद्मायत-चारुनेत्रं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
ulUkhale baddham-udArashauryam uttunga-yugmArjuna-bhangaleelam
utpulla-padmAyata-chArunetram bAlam mukundam manasA smarAmi  

आलोक्य मातुर्मुखमादरेण स्तन्यं पिबन्तं सरसीरुहाक्षं
सच्चिन्मयं देवं-अनन्तरूपं  बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ||
 Alokya mAturmukhamAdareNa stanyam pibantam sarasIruhAksham
 sacchinmayam devam-anantarUpam bAlam mukundam manasA smarAmi 

मंगलवार, 15 मार्च 2016

।।सूर्य उपासना।। - कथा वाचन

कृष्णपुत्र साम्ब ने सूर्य उपासना कर सूर्य को प्रसन्न किया


एक बार की बात है कि रघुवंश में जन्मे राजा बृहदबल ने राजगुरु वशिष्ट से पूछा-"गुरुदेव ! क्या कोई ऐसा देवता है जिसकी पूजा अर्चना करके मोक्ष प्राप्त करके जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा प्राप्त किया जा सके ? राजगुरु वशिष्ठ मुस्करा दिये
" मैं जानना चाहता हूँ, गुरुदेव !" राजा बृहदबल ने अपने प्रश्न को स्पष्ट करते हुए आगे कहा-" देवताओं का भी देवता कौन है ? पितरों का भी पितर कौन है ? मैं उसके विषय में जानना चाहता हूँ , जिसके ऊपर कोई न हो। मैं उस परब्रह्म सनातन का ज्ञान करना चाहता हूँ। मुझे उस स्वर्ग की अभिलाषा नहीं है, जहाँ पर जाकर पुन: संसार चक्र में आकर फंसना होता है अत: हे गुरुदेव! आप मुझ पर अपने ज्ञान की अमृत वर्षा करते हुए बताएँ कि यह स्थावर जंगम किससे जन्मता है और किसमें इसका विलय हो जाता है ?"
राजगुरु वशिष्ठ ने कहा-"रघुवंश नरेश! आपने एक ऐसा रहस्य जानना चाहा है जो कि स्वयं प्रकट है परन्तु खेद की बात यह है कि कोई उसे जानता या समझता नहीं। आपने जग कल्याण के हेतु यह प्रश्न किया है अत: मैं इस विषय में स्पष्ट बात करना चाहता हूँ और वह यह है कि जो सूर्य उदय होकर संसार को अंधकार से मुक्त करता है वही पूर्णरुपेण आदि और अनादि है। इसके ऊपर कोई भी नहीं है। यही शाश्वत तथा अव्यय है यही जगत का नाथ है यही जगत का कर्म साक्षी है। रात में उत्पन्न होने वाले सभी जड जंगम इसी से उत्पन्न होते और समय पाकर इसी में विलीन हो जाते हैं। सूर्य ही धाता है, सूर्य ही विधाता है। यह अग्रजन्मा तथा भूत भावन है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश भी यही है। सूर्य प्रतिदिन अक्षय मण्डल में स्थित रहता है। यही देवताओं का देव तथा पितरों का पिता है। इसी की पूजा अर्चना से ऐसा मोक्ष प्राप्त होता है जिससे कि पुन: आवागमन में फंसना नही पडता। इसी से जगत का शुभारम्भ हुआ है और इसी में विलीन हो जायेगा।"
राजा बृहदबल ने पूछा-" आपके स्पष्टीकरण से यही समझ सका हूँ कि सूर्य ही सर्वेश्वर है "
"आपने ठीक समझा।" वशिष्ठ ने कहा।
राजगुरु वशिष्ट की बात को भलिभाँति समझ लेने के बाद राजा बृहदबल ने पूछा-"क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ पर इनका पूजन करने से स्वयं ही पूजन स्वीकार करते हैं? जिसे इनका आद्य स्थान कहा जाए?"
वशिष्ठ जी ने कहा-"रघुवंश नरेश! एक नदी जिसका नाम चन्द्रभागा है, के तट पर साम्ब नगर बसा हुआ है, जहाँ पर भगवान सूर्य नित्य विराजते हैं और यहीं पर पूर्ण विधि से की गई पूजा को भगवान सूर्य स्वयं ग्रहण करते हैं।"
राजा बृहदबल ने पूछा-"केवल इसी स्थान का महत्त्व क्यों है? कृपया स्पष्ट करें।"
राजगुरु वशिष्ट बोले-"अदिति के बारह पुत्र हुए थे जिन्हें कि द्वादश आदित्य कहा जाता है।" इन द्वादश आदित्यों में दसवें आदि विष्णु नामक अदिति के पुत्र हैं। इन्हीं विष्णु ने वासुदेव के घर कृष्ण अवतार लिया है तथा इन्हीं कृष्ण के पुत्र साम्ब हुए हैं । एक बार कृष्ण अपने साथ ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद जी को लेकर द्वारका में आये। देवऋषि नारद को देखकर सभी उनका स्वागत सत्कार करने लगे पर राजकुमार साम्ब अभाग्यवश उनकी अवहेलना करता रहा। इस कारण नारद को क्रोध आ गया और उन्होंने मन ही मन एक योजना बना ली। विदा होते समय नारद ने कृष्ण को बताया "तुम्हारे पुत्र साम्ब का रुप और यौवन इतना अधिक आ गया है कि तुम्हारी सोलह हजार रानियाँ भी उसे देखकर विचलित हो जाती हैं।"
"इस बात पर कृष्ण ने विश्वास न किया और बात आई गई हो गयी। कुछ कालोपरान्त नारद पुन: द्वारका में आ गये। इस समय कृष्ण सुरम्य रैवतक पर्वत पर एक उद्यान में अपनी रानियों के साथ क्रीडा कर रहे थे। सभी ने भरपूर श्रृंगार कर रखा था और कुछ ने काम क्रीडार्थ वस्त्र त्याग रखे थे और मधुर सुरासव पिया तथा पिलाया जा रहा था। यह समझकर के सभी नशे में बेसुध हैं, नारद ने अपनी योजना को कार्यरुप दिया। वह साम्ब के पास जाकर बोले कि रैवतक पर्वत पर स्थित तुम्हारे पिता तुम्हें बुला रहे हैं।
"यह बात सुनकर साम्ब तुरन्त ही वहाँ पर पहुँच गया और पिता कृष्ण को प्रणाम करके खडा हो गया। इस मदहोशी की स्थिति में साम्ब को अतुल रुप यौवन सम्पन्न देख कर उसके प्रति कई रानियाँ कामुक हो विचलित हो उठीं। ऐसे ही वातावरण में नारद ने प्रवेश किया। इन्हें देखकर रानियाँ जिस स्थिति में थीं, वैसे ही आदरभाव में खडी हो गयीं। अपनी रानियों को नग्न एवं किसी परपुरुष के सामने ऐसी स्थिति में देखकर कृष्ण को क्रोध आ गया और इसी क्रोध में उन्होनें रानियों को श्राप देते हुए कहा-"हे रानियों! तुम्हें इस दशा में देखकर तथा परपुरुष में आसक्त देखकर श्राप देता हूँ कि तम्हें पति सुख न मिलेगा, स्वर्ग न मिलेगा तथा डाकुओं के ही सम्पर्क में रह सकोगी(इस श्राप से केवल रुक्मिणी, सत्यभामा और जांबवती ही मुक्त रह सकी थी।)। इसके बाद कृष्ण ने साम्ब को भी श्राप देते हुए कहा- साम्ब! तुम्हारे जिस अनन्त यौवन को देखकर ये रानियाँ विचलित हुई हैं, यह कोढ से नष्ट हो जायेगा।"
इस श्राप के प्रभाव से साम्ब की देह गलने लगी तब वह नारद से इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछने लगा। देवऋषि नारद से इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछने लगा। देवऋषि नारद ने तब उसे सूर्य की उपासना करने को कहा।
हे रघुवंश नरेश बृहदबल! राजगुरु समझाते हुए बोले-"कृष्ण से श्राप प्राप्त होने पर रानियों को स्वर्ग न मिल सका और वे भटकने लगीं। पंचनद प्रदेश में इन्हें अर्जुन से छीनकर डाकू ले गये। देवऋषि नारद से उपाय जानकर कृष्णपुत्र साम्ब ने सूर्य उपासना कर सूर्य को प्रसन्न किया, जिससे उसका कोढ समाप्त हो गया और वह पुन: स्वस्थ सबल हो गया। जहाँ साम्ब को श्राप से मुक्ति मिली थी, वहीं साम्ब नगर है और वहीं पर साम्ब ने सूर्य का एक मन्दिर भी बनवाया।"
इस प्रकार राजा बृहदबल ने राजगुरु वशिष्ट से आदित्य के विषय में जानकर सूर्य उपासना की और परम मोक्ष को प्राप्त हुए।

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

सूर्यार्घ्य मंत्र - Suryarghya Mantras...

Suryarghya (सूर्यार्घ्य मंत्र) Mantras...

सूर्यार्घ्य मंत्र - Suryarghya Mantras...


LYRICS (Sanskrit)

एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो ! तेजोराशे ! जगत्पते |
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं नमोस्तुते ||

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम् |
तापत्रयविमोक्षाय तवार्घ्यं कल्प्याम्यहम् ||

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे |
दत्तमर्घ्य मया भानो ! त्वं गृहाण नमोस्तुते ||

अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतैः सह |
करुणां कुरु मे देव गृहाणार्घ्यं नमोस्तुते ||

नमोस्तु सूर्याय सहस्त्रभानवे नमोस्तु वैश्वानर- जातवेदसे |
त्वमेव चार्घ्य प्रतिगृह्ण देव ! देवाधिदेवाय नमो नमस्ते ||




LYRICS (English)
Ehi surya ! Sahastraansho ! Tejoraashe ! Jagatpate |
Anukampya maam bhaktyaa grihaanaarghyam namo-stute ||

Taapatrayaharam divyam parmaanandlakshanam |
Taapatrayavimokshaaya tavaarghya kalpayaamyaham ||

Namo bhagavate tubhyam namaste jaatavedase |
Duttamarghya mayaa bhano ! ttvam grihaana namo-stute ||

Arghyam grihaana devesha gandhpushpaakshataiha saha |
Karunaam Kurume deva grihaanaarghya namo-stute ||

Namostu suryaaya sahastrabhaanave
Namostu vaishvaanar-jaatvedasa |
Ttvameva chaarghyam pratigrihana deva !
Devaadhidevaaya namo Namaste ||

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

॥ मंगलाचरण - सुन्दरकाण्ड ॥

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥1॥

भावार्थ:-शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ॥1॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए॥2॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥

भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥3॥

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

हनुमान चालीसा - तुलसीदास कृत-श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारी, बनरऊँ रघुवर विमल जसु जो दायकु फल चारी


Hanuman Chalisa
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारी ।।
बनरऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारी ।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरों पवन कुमार ।।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहुकलेस विकार ।।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।  जय कपीस तिहूँ लोक उजागर ।।
रामदूत अतुलित बल धामा।  अंजनी पुत्र पवनसुत नामा ।।
महावीर विक्रम बजरंगी।  कुमति निवार सुमति के संगी ।।
कंचन बरन विराज सुबेसा।  कानन कुण्डल कुंचित केसा ।।
हाथ बज्र औ ध्वजा विराजे।  काँधे मूँज जनेऊ साजे ।।
संकर सुवन केसरीनंदन।  तेज प्रतापमहा जग बन्दन ।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।  राम काज करिबे को आतुर ।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।  राम लखन सीता मन बसिया ।।
सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।  विकट रूप धरि लंक जरावा ।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे।  रामचंद्र के काज सँवारे ।।
लाय संजीवन लखन जियाये।  श्री रघुवीर हरषि उर लाये ।।
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई।  तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावें।  अस कहीश्रीपति कठ लगावें ।।
सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा।  नारद सारद सहित अहीसा ।।
जम कुबेर दिकपाल जहाँ ते।  कवि कोविद कही सके कहाँ ते ।।
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।  राममिलाय राजपद दीन्हा ।।
तुम्हरो मन्त्र विभीसन माना।  लंकेस्वर भये सब जग जाना ।।
जुग सहस जोजन पर भानु।  लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।।
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहि।  जलधि लांघी गये अचरज नाही ।।
दर्गम काज जगत के जेते।  सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।।
राम दुआरे तुम रखवारे।  होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।।
सब सुख लहें तुम्हारी सरना।  तुम रक्षक काहू को डरना ।।
आपन तेज सम्हारो आपे।  तीनो लोक हाँक ते काँपे ।।
भूत पिशाच निकट नहि आवे।  महावीर जब नाम नाम सुनावे ।।
नासे रोग हरि सब पीरा।  जपत निरंतरहनुमत बीरा ।।
संकट ते हनुमान छुडावे।  मन क्रम वचन ध्यान जो लावे ।।
सब पर राम तपस्वी राजा।  तिन के काज सकल तुम साजा ।।
और मनोरथ जो कोई लावे।  सोई अमित जीवन फल पावे ।।
चारों जुग प्रताप तुम्हारा।  हें परसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधु संत के तुम रखवारे।  असुर निकन्दन राम दुलारे ।।
अस्ट सिद्धि नों निधि के दाता।  असबर दीन जानकी माता ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।  सदा रहो रघुपति के दासा ।।
तुम्हरे भजन राम को पावे।  जनम जनमके दुःख बिसरावे ।।
अन्त काल रघुवर पुर जाई।  जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।।
और देवता चित्त न धरई।  हनुमत सेई सर्ब सुख करई ।।
संकट कटे मिटे सब पीरा।  जो सुमिरेहनुमत बलबीरा ।।
जे जे जे हनुमान गोसाई।  कृपा कहु गुरुदेव की नाई ।।
जो सत बार पाठ कर कोई।  छुटेहि बंदि महा सुख होई ।।
जो यह पड़े हनुमान चालीसा।  होई सिद्धि साखी गोरिसा ।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।  कीजे नाथ ह्रदय महँ डेरा ।।

पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

सूर्य देव की आरती

सूर्य देव की आरती

आरती - 1
सूर्य देव की आरती 
 
जय कश्यप नन्दन, ऊँ जय अदिति नन्दन।
द्दिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥ ऊँ जय….
जय सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥ ऊँ जय….
जय सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥ ऊँ जय….
जय सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥ ऊँ जय…
जय कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥ ऊँ जय…
जय नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥ ऊँ जय…
जय सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥ जय ..


आरती -2 
सूर्य देव आरती 

 जय जय जय रविदेव जय जय जय रविदेव l
रजनीपति मदहारी शतलद जीवन दाता ll
पटपद मन मदुकारी हे दिनमण दाता l
जग के हे रविदेव जय जय जय स्वदेव ll
नभ मंडल के वाणी ज्योति प्रकाशक देवा l
निजजन हित सुखराशी तेरी हम सब सेवा ll
करते हैं रविदेव जय जय जय रविदेव l
कनक बदन मन मोहित रुचिर प्रभा प्यारी ll
नित मंडल से मंडित अजर अमर छविधारी l
हे सुरवर रविदेव जय जय जय रविदेव ll

श्री सूर्य देव चालीसा

 
श्री सूर्य देव
॥दोहा॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥

॥चौपाई॥
जय सविता जय जयति दिवाकर!। सहस्त्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर!। सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित। भास्कर करत सदा मुखको हित॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
अस जोजन अपने मन माहीं। भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥
॥दोहा॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥