बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

श्री गणेश चालिसा (Shri Ganesh Chalisa)


जय गणपति सदगुण सदन,
कविवर बदन कृपाल,
विघ्न हरण मंगल करन,
जय जय गिरिजालाल

जय जय जय गणपति गणराजू,
मंगल भरण करण शुभः काजू,
जय गजबदन सदन सुखदाता,
विश्व विनायका बुद्धि विधाता

वक्रतुंडा शुची शुन्दा सुहावना,
तिलका त्रिपुन्दा भाल मन भावन,
राजता मणि मुक्ताना उर माला,
स्वर्ण मुकुता शिरा नयन विशाला

पुस्तक पानी कुथार त्रिशूलं,
मोदक भोग सुगन्धित फूलं,
सुन्दर पीताम्बर तन साजित,
चरण पादुका मुनि मन राजित

धनि शिव सुवन शादानना भ्राता,
गौरी लालन विश्व-विख्याता,
रिद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे,
मूषका वाहन सोहत द्वारे

कहूं जन्मा शुभ कथा तुम्हारी,
अति शुची पावन मंगलकारी,
एक समय गिरिराज कुमारी,
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा,
तब पहुँच्यो तुम धरी द्विजा रूपा,
अतिथि जानी के गौरी सुखारी,
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी

अति प्रसन्ना हवाई तुम वरा दीन्हा,
मातु पुत्र हित जो टाप कीन्हा,
मिलही पुत्र तुही, बुद्धि विशाला,
बिना गर्भा धारण यही काला

गणनायक गुण ज्ञान निधाना,
पूजित प्रथम रूप भगवाना,
असा कही अंतर्ध्याना रूप हवाई,
पालना पर बालक स्वरूप हवाई

बनिशिशुरुदंजबहितुम थाना,
लखी मुख सुख नहीं गौरी समाना,
सकल मगन सुखा मंगल गावहीं,
नाभा ते सुरन सुमन वर्शावाहीं

शम्भू उमा बहुदान लुतावाहीं,
सुरा मुनिजन सुत देखन आवहिं,
लखी अति आनंद मंगल साजा,
देखन भी आए शनि राजा

निज अवगुण गाणी शनि मन माहीं,
बालक देखन चाहत नाहीं,
गिरिजा कछु मन भेद बढायो,
उत्सव मोरा न शनि तुही भायो

कहना लगे शनि मन सकुचाई,
का करिहौ शिशु मोहि दिखायी,
नहीं विश्वास उमा उर भयू,
शनि सों बालक देखन कह्यौ

पदताहीं शनि द्रिगाकोना प्रकाशा,
बालक सिरा उडी गयो आकाशा,
गिरजा गिरी विकला हवाई धरणी,
सो दुख दशा गयो नहीं वरनी


हाहाकार मच्यो कैलाशा,
शनि कीन्हों लखी सुत को नाशा,
तुरत गरुडा चढी विष्णु सिधाए,
काटी चक्र सो गजशिरा लाये

बालक के धड़ ऊपर धारयो,
प्राण मंत्र पढ़ी शंकर दारयो,
नाम’गणेशा’शम्भुताबकीन्हे,
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा,
पृथ्वी कर प्रदक्षिना लीन्हा,
चले शदानना भरमि भुलाई,
रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई

चरण मातु-पितु के धारा लीन्हें,
तिनके सात प्रदक्षिना कीन्हें
धनि गणेशा कही शिव हिये हरष्यो,
नाभा ते सुरन सुमन बहु बरसे

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढाई,
शेष सहसा मुख सके न गई,
मैं मति हीन मलीना दुखारी,
करहूँ कौन विधि विनय तुम्हारी

भजता ‘रामसुन्दर’ प्रभुदासा,
जगा प्रयागा ककरा दुर्वासा,
अब प्रभु दया दीना पर कीजै,
अपनी भक्ति शक्ति कुछा दीजै

ll दोहा ll

श्री गणेशा यह चालीसा, पाठा कर्रे धरा ध्यान l
नीता नव मंगल ग्रह बसे, लहे जगत सनमाना ll
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेशा l
पूर्ण चालीसा भयो, मंगला मूर्ती गणेशा ll

श्री गणेश जी की आरती


Shri Ganesh
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
लडुअन के भोग लागे, सन्त करें सेवा। जय ..
एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी।
मस्तक सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥ जय ..
अन्धन को आंख देत, कोढि़न को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ जय ..
हार चढ़े, पुष्प चढ़े और चढ़े मेवा।
सब काम सिद्ध करें, श्री गणेश देवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
विघ्न विनाशक स्वामी, सुख सम्पत्ति देवा॥ जय ..
पार्वती के पुत्र कहावो, शंकर सुत स्वामी।
गजानन्द गणनायक, भक्तन के स्वामी॥ जय ..
ऋद्धि सिद्धि के मालिक मूषक सवारी।
कर जोड़े विनती करते आनन्द उर भारी॥ जय ..
प्रथम आपको पूजत शुभ मंगल दाता।
सिद्धि होय सब कारज, दारिद्र हट जाता॥ जय ..
सुंड सुंडला, इन्द इन्दाला, मस्तक पर चंदा।
कारज सिद्ध करावो, काटो सब फन्दा॥ जय ..
गणपत जी की आरती जो कोई नर गावै।
तब बैकुण्ठ परम पद निश्चय ही पावै॥ जय .॥


श्री पार्वती माता की आरती


जय पार्वती माता, जय पार्वती माता।
ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता॥ जय..
अरिकुल पद्म विनासनि जय सेवक त्राता।
जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥ जय..
सिंह को वाहन साजे, कुण्डल है साथा।
देव वधू जह गावत, नृत्य करत ता था॥ जय..
सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता।
हेमांचल घर जन्मी, सखियन संगराता॥ जय..
शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्याता।
सहस्त्र भुज तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥ जय..
सृष्टि रूप तुही है, जननी शिवसंग रंगराता।
नन्दी भृङ्गी बीन लही सारा मदमाता॥ जय..
देवन अरज करत हम चित को लाता।
गावत दे दे ताली, मन में रङ्गराता॥ जय..
श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।
सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥ जय..

श्रीमद्भागवत आरती


आरती अतिपावन पुरान की,
धर्मभक्ति विज्ञान खान की। आरती ..
महापुराण भागवत निर्मल।
शुक मुख विगलित निगम कल्प फल।
परमानन्द सुधा रसमय कल।
लीला रति रस रसनिधान की। आरती ..
कलिमय मथनि त्रिताप निवारिणि।
जन्म मृत्युमय, भव-भयहारिणि।
सेवत सतत सकल सुखकारिणि।
सुमहौषधि हरि चरित गान की। आरती ..
विषय विलास विमोह विनासिनि।
विमल विराग विवेक विकासिनि।
भगवत् तत्व रहस्य प्रकासिनि।
परम ज्योति परमात्मज्ञान की। आरती ..
परमहंस मुनिमन उल्लासिनि।
रसिक हृदय, रसरासि विलासिनि।
मुक्ति-मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि।
कथा अकि†चन प्रिय सुजान की। आरती ..

बृहस्पति देव महाराज की आरती


जय बृहस्पति देवा, स्वामी जय बृहस्पति देवा।
प्रतिदिन भोग लगाऊं, फल मेवा॥ \ जय ..
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
जगत पिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥ \ जय ..
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हर्ता। \ जय ..
तन-मन-धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
तब प्रभु प्रगट होकर, आकर द्वार खड़े॥ \ जय ..
दीन-दयाल, दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप, दोष सब हर्ता, भवबंधन हारी॥ \ जय ..
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारी।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥ \ जय ..
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।
सुख, आनंद, यश फैले, मनवांछित फल पावे॥ \ जय ..

श्री दुर्गा जी की आरती


जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय!
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी ..
तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी ..
आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी ..
अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी ..
तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी ..
राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वा†छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाघा॥ जगजननी ..
दश विद्या, नव दुर्गा नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥ जगजननी ..
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥ जगजननी ..
सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥ जगजननी ..
तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥ जगजननी ..
मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ जगजननी ..
शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥ जगजननी ..
हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जगजननी ..
निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥ जगजननी .. (द्बद्ब)
अम्बे तू है जगदम्बे, काली जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएं भारती॥

गजवदन विनायक की आरती


सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥ आरती ..
एकदंत, शशिभाल, गजानन,
विघ्नविनासक, शुभगुण कानन,
शिवसुत, वन्द्यमान-चतुरानन,
दु:खविनाशक, सुखदायक की। आरती ..
ऋद्धि-सिद्धि स्वामी समर्थ अति,
विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
अघ-वन-दहन, अमल अविगत गति,
विद्या, विनय-विभव दायक की। आरती ..
पिङ्गलनयन, विशाल शुंडधर,
धूम्रवर्ण, शुचि वज्रांकुश-कर,
लम्बोदर, बाधा-विपत्ति-हर,
सुर-वन्दित सब बिधिलायक की॥ आरती ..

श्री गंगा जी की आरती


जय गंगे माता श्री जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
जय गंगे माता॥1॥
चन्द्र सी जो तुम्हारी जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
जय गंगे माता॥2॥
पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी त्रिभुवन सुख दाता॥
जय गंगे माता॥3॥
एक ही बार जो तेरी शरणागति आता।
यम की त्रास मिटाकर परमगति पाता॥
जग गंगे माता॥4॥
आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता।
अर्जुन वहीं सहज में मुक्ति को पाता॥
जय गंगे माता॥5॥